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फिल्म ‘नोटबुक’ की समीक्षा

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कश्मीर की वादियों में एक अलग - सी प्रेम कहानी राजीव रंजन निर्देशक :   नितिन कक्कड़ कलाकार :   जहीर इकबाल ,   प्रनूतन बहल 2.5   स्टार   ( ढाई स्टार ) प्यार एक ऐसा एहसास है ,   जो कभी भी ,   कहीं भी ,   कैसे भी हो सकता है। पहली नजर में हो सकता है ,   बिना देखे भी हो सकता है और डायरी में लिखी बातें पढ़ कर भी हो सकता है। थाईलैंड की फिल्म   ‘ टीचर्स डायरी ’   पर आधारित सलमान खान प्रोडक्शंस की   ‘ नोटबुक ’   प्यार की एक ऐसी कहानी है ,   जहां नायक - नायिका एक नोटबुक के जरिये प्यार की डोर में बंध जाते हैं। पूर्व फौजी कबीर   ( जहीर इकबाल )   एक विस्थापित कश्मीरी पंडित है ,   जो जम्मू में रहता है। उसके पिता ने कभी वूलर में एक स्कूल शुरू किया था ,   जो टीचर के अभाव में बंद होने की कगार पर है। कबीर उस स्कूल में टीचर बन जाता है। पहले तो बच्चे उससे खिंचे खिंचे रहते हैं ,   पर बाद में उसे स्वीकार कर लेते हैं। उसी स्कूल में पहले फिरदौस   ( प्रनूतन बहल )   पढ़ाती थी। कबीर को उसकी नोटबु...

फिल्म केसरी की समीक्षा

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असली महानायकों की दास्तान राजीव रंजन कलाकार:  अक्षय कुमार ,  परिणीति चोपड़ा ,  राकेश चतुर्वेदी ,  विक्रम कोचर ,  सुविंदर विक्की ,  वंश भारद्वाज ,  सुरमीत सिंह बेसरा ,  अश्वत्थ भट्ट ,  मीर सरवर निर्देशक:  अनुराग सिंह स्टार-  3.5 ( साढ़े तीन) स्टार 12  सितंबर  1897  को तत्कालीन भारत के नॉर्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्रांत (अब पाकिस्तान का खैबर पख्तुनवा प्रांत) में हुई  ‘ सारागढ़ी की लड़ाई ’  भारत ही नहीं ,  विश्व इतिहास की सबसे गौरवपूर्ण गाथाओं में से एक है। सुबह से शाम तक चली इस लड़ाई सिख सैनिकों ने जिस शौर्य का प्रदर्शन किया था ,  वह अतुलनीय है। सिर्फ इक्कीस सिख सिपाहियों ने दस हजार से ज्यादा अफगानों को तब तक रोके रखा ,  जब तक कि आखिरी सिपाही नहीं शहीद हो गया। इस लड़ाई में  21  सिख सैनिक और करीब  600  अफगान मारे गए थे। दो दिन बाद ब्रिटिश भारतीय फौज की एक दूसरी टुकड़ी ने अफगानों को खदेड़ कर सारागढ़ी पर फिर से कब्जा कर लिया था। लेकिन क्या विडंबना है कि शौर्य की इस महान गाथा क...

फिल्म ‘मिलन टॉकीज’ की समीक्षा

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पूरा फिल्मी है ये मिलन राजीव रंजन निर्देशक: तिग्मांशु धूलिया कलाकार: अली फजल ,  श्रद्धा श्रीनाथ ,  संजय मिश्रा ,  आशुतोष राणा ,  सिकंदर खेर दो स्टार ( 2  स्टार) तिग्मांशु धूलिया जिस तरह की फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं , ‘ मिलन टॉकीज ’  वैसी फिल्म नहीं है और वह जिस तरह से फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं ,  यह वैसी भी नहीं है। उन्होंने इस बार एक रोमांटिक फिल्म में हाथ आजमाया है ,  जिसमें थोड़ी-सी कॉमेडी भी है और थोड़ा-सा एक्शन भी। लेकिन यह खिचड़ी न तो स्वादिष्ट  है और न ही सेहतमंद। अगर इस फिल्म में तिग्मांशु की पुरानी फिल्मों जैसा कुछ है ,  तो वह है हिन्दी हार्टलैंड की धड़कन ,  मगर वह भी थोड़ी-सी ही। यानी इस फिल्म बहुत कुछ है ,  मगर सब थोड़ा-थोड़ा। इलाहाबाद (अब प्रयागराज) का अनिरुद्ध  उर्फ अन्नु (अली फैजल) फिल्म निर्देशक बनना चाहता है और गुजारे के लिए छात्रों को पास कराने का ठेका भी लेता है। इसी क्रम में उसे मैथिली (श्रद्धा श्रीनाथ) को पास कराने का ठेका मिलता है। उसे मैथिली से प्यार हो जाता है ,  लेकिन...

फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ की समीक्षा

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टॉयलेट: एक मां-बेटा कथा राजीव रंजन निर्देशक: राकेश ओमप्रकाश मेहरा कलाकार: अंजलि पाटिल ,  ओम कनौजिया ,  अतुल कुलकर्णी ,  मकरंद देशपांडे दो स्टार ( 2  स्टार) कई फिल्में ऐसी होती हैं ,  जो गंभीर बात कहती हैं ,  लेकिन गंभीरता से नहीं कह पातीं। राकेश ओमप्रकाश मेहरा निर्देशित  ‘ मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर ’  भी एक ऐसी ही फिल्म है। यह खुले में शौच की मजबूरी के कारण महिलाओं के साथ होने वाले यौन अपराधों की गंभीर समस्या को उठाती है। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म इतनी बिखरी हुई है कि उसका कोई आकार ही नहीं बन पाता। सरगम (अंजलि पाटिल) मुंबई की एक झोपड़पट्टी में अपने  8-9  साल के बेटे कन्हैया उर्फ कन्नु (ओम कनौजिया) के साथ रहती है। उनके और बस्ती के दूसरे घरों में भी स्मार्ट फोन है ,  टीवी है और सामान्य जीवन के लिए जरूरी दूसरी चीजें भी ,  पर टॉयलेट नहीं है। यहां तक कि पूरी बस्ती में एक भी टॉयलेट नहीं है। लोग पहाड़ी पर ,  नाले के पास टॉयलेट के लिए जाते हैं। औरतों को तो उजाला होने के पहले ही जाना पड़ता है। एक दिन सरगम को शौ...

फिल्म ‘कैप्टन मार्वल’ की समीक्षा

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बड़ी लड़ाई के पहले की झांकी! राजीव रंजन निर्देशक: एना बोडेन और रयान फ्लेक कलाकार: ब्री लार्सन , सैमुअल एल. जैक्सन , बेन मेन्डेल्सन , जूड लॉ , ली पेस ढाई स्टार ( 2.5 स्टार) अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर रिलीज हुई ‘ कैप्टन मार्वल ’ मार्वल स्टूडियो की पहली सोलो महिला सुपरहीरो फिल्म है। इसे स्टूडियो की तरफ से महिला सशक्तीकरण के एक संदेश के रूप में देखा जा सकता है। इससे पहले मार्वल स्टूडियो की 20 फिल्में आ चुकी हैं। वैसे 2018 में आई ‘ एंट मैन एंड द वास्प ’ में भी महिला सुपरहीरो थी , लेकिन उसके साथ एक पुरुष सुपरहीरो भी था। तो ‘ कैप्टन मार्वल ’ इस मायने में खास है कि पूरी फिल्म महिला सुपरहीरो के कंधों पर ही आगे बढ़ती है। इसके अलावा , निर्देशन (एना बॉडन) और लेखन (एना बॉडन व जेनेवा रॉबर्ट्सन ड्वोरेट) में भी महिलाएं अहम भूमिका में हैं। फिल्म की कहानी सन् 1995 की है। यानी यह कहानी तब की है , जब मार्वल का कोई सुपरहीरो अस्तित्व में नहीं आया था। मार्वल की पहली सुपरहीरो फिल्म ‘ थोर ’ 2008 में आई थी। तो कह सकते हैं कि यह फिल्म मार्वल स्टूडियो के पहले सुपरहीरो की भी कहानी ह...

फिल्म ‘सोनचिड़िया’ की समीक्षा

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चंबल के डाकुओं और उस समय का सच राजीव रंजन कलाकार: मनोज बाजपेयी ,  सुशांत सिंह राजपूत ,  रणवीर शौरी ,  भूमि पेडणेकर ,  आशुतोष राणा निर्देशक: अभिषेक चौबे तीन स्टार ( 3  स्टार) करीब  20  साल पहले भिंड जिले (चंबल क्षेत्र) के निवासी एक दोस्त से डकैती फिल्मों पर बात हो रही थी। उसने व्यंग्य से कहा कि हिन्दी फिल्मों में बीहड़ के डाकुओं को घोड़े पर बैठ कर आते-जाते दिखाया जाता है। बॉलीवुड वाले चंबल देख लें ,  तो उनको समझ में आ जाएगा कि सच्चाई क्या है। डाकुओं के जीवन पर बॉलीवुड में ढेर सारी फिल्में बनी हैं और सफल भी रही हैं।  60  और  70  के दशक में तो ऐसी फिल्मों की भरमार थी। इन फिल्मों ने डाकुओं की छवि जो जनमानस में पेश की ,  वह सच्चाई से कोसों दूर है। इस प्रचलित छवि को तोड़ने का काम शेखर कपूर निर्देशित  ‘ बैंडिट क्वीन ’  और तिग्मांशु धूलिया निर्देशित  ‘ पान सिंह तोमर ’  ने किया। अभिषेक चौबे निर्देशित  ‘ सोनचिड़िया ’  भी काफी हद तक यह काम करती है। एक दौर था ,  जब चंबल के बीहड़ों में डाकु...