संदेश

मोहाज़िर

राजीव रंजन देस बनाना चाहा था परदेस को देस छूट गया और परदेस परदेस ही रहा. बंट गया हूँ कई हिस्सों में. जिस्म लोटता है लहुलूहान होता है परदेस की मिटटी में. रूह भटकती है ठिकाना खोजती है देस की माटी में. वर्षों बीत जाते हैं परदेस को अपना बनाते पर हाथ लगता है सिर्फ एक मुश्त-ए-गुबार. एक मुद्दत के बाद देस भी बेगाना हो जाता है. तनहाइयों के सफर में भटकने वाले मुसाफिर यादों के मोहाज़िर होते हैं.

शून्य

राजीव रंजन जाड़े की सर्द हवा दरवाजों पर दस्तक देती है ऐसे जैसे कोई हलके हाथों से दरवाजा खटखटा रहा हो उठता हूँ सिगरेट की राख झाडते हुए दरवाजा खोलता हूँ लेकिन कुछ भी दिखाई नहीं देता हवा भी नहीं सिर्फ महसूस होती है उसकी चुभन और दिखता है केवल सिगरेट का खाली धुआं. फिर मैं झाड़ देता हूँ सिगरेट की बची राख.

एक बुल्गारियन कविता

एक पेड़ था जिस पर सूरज रहा करता था वो कुल्हाडे से काट दिया गया और उसका का कागज़ बना लिया गया अब उसी कागज़ पर मैं उस पेड़ की गाथा लिख रही हूँ जिस पर कभी सूरज का कयाम था... (बुल्गारियन शायरा ब्लागा दिमित्रोवा की नज्म )

हजारी प्रसाद द्विवेदी की कुछ पंक्तियाँ

एकांत का तप बड़ा तप नहीं है. संसार में कितना कष्ट है, रोग है, शोक है, दरिद्रता है, कुसंस्कार है. लोग दुख से व्याकुल हैं. उनमें जाना चाहिए. उनके दुख का भागी बनकर उनका कष्ट दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए. यही वास्तविक तप है. जिसे यह सत्य प्रकट हो गया कि सर्वत्र एक ही आत्मा विद्यमान है, वह दुख-कष्ट से जर्जर मानवता की कैसे उपेक्षा कर सकता है. (" अनामदास का पोथा" उपन्यास का अंश)

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता

तुम्हारे साथ रह कर अक्सर मुझे लगा है कि हम असमर्थताओं से नहीं संभावनाओं से घिरे हैं हर दीवार में एक द्वार बन सकता है और हर द्वार से एक पूरा का पूरा पहाड़ गुज़र सकता है शक्ति अगर सीमित है तो हर चीज़ अशक्त भी है भुजाएं अगर छोटी हैं तो सागर भी सिमटा है सामर्थ्य इच्छा का केवल दूसरा नाम है जीवन और मृत्यु के बीच जो भूमि है वह नियति की नहीं मेरी है.

कीमत

राजीव रंजन सुबह-सुबह खपरे की दरारों से घुस आती थी सूरज की किरणें रात को छन कर गिरती थी चांदनी इन्हीं दरारों से लेट कर ताकता रहता था इन्हीं दरारों को सूरज मुझे जगाता था चांदनी सुलाती थी मगर अब यह सब गुज़रे वक़्त की बात है बंद हो गई हैं दरारें राजधानी के कमरे में ईंट, गिट्टी और सरिये से नींद खुलती है अब घड़ी के अलार्म से आंख लगते-लगते बीत जाता है रात का तीसरा पहर महत्वाकांक्षाओं की कीमत चुकानी पडी है सूरज, चांदनी और नींद से

जवाब

राजीव रंजन एक ही सवाल कई बार मैंने कई तरह से पूछा इस उम्मीद में कि शायद जवाब कुछ अलग मिले मगर, हर बार अलग-अलग तरीकों से वही जवाब आया मैंने सवाल बदल दिया पर, जवाब वही रहा दरअसल, जवाब सवालों पर नहीं, जवाब देने वालों पर निर्भर करते है।