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सरफरोशी की तमन्‍ना अब हमारे दिल में है

सरफरोशी की तमन्‍ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है। रहबरे राहे मुहब्‍बत रह न जाना राह में लज्‍जते सहरा नवर्दी, दूरो-ए-मंजिल में है। वक्‍त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमां हम अभी से क्‍या बताएं, क्‍या हमारे दिल में है। आज फिर मकतल में थे, कातिल कह रहा है बार-बार क्‍या तमन्‍ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है। ऐ शहीदों मुल्‍को मिल्‍ल्‍त, मैं तेरे जज्‍बों के निसार अब तेरी कुर्बानी का चर्चा, गैर की महफिल में है। अब न अहले बलबले हैं और न अरमानों की भीड़ एक मिट जाने की हसरत दिल-ए-बिस्म्ल्लि में है। सरफरोशी की तमन्‍ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना बाजु-ए-कातिल में है।

पॉल पॉट्स की कुछ कविताएं

(अनुवाद- अमृता प्रीतम) 1. जब तुमने मेरे प्‍यार को स्‍वीकारने से इंकार कर दिया मैंने चौखट से गुजरे बिना तुम्‍हारे सोने के कमरे का दरवाजा भिड़का दिया। और अपने हाथ में पकड़ी हुई विवाह की अंगुठी को बाहर सड़क पर खड़े हुए- एक भिखारी के पात्र में डाल दिया उस दिन हमारी भाषा के शब्‍द भी कराह रहे थे जिस दिन मैंने तुम्‍हे अलविदा कही। 2. जैसे हमारी तारीख दो हिस्‍सों में बंटी हुई है ईसा के जन्‍म के पहले और ईसा के जन्‍म के बाद मेरी जिंदगी भी दो हिस्‍सों में बंटी हुई है तुम्‍हे देखने से पहले, और तुम्‍हे देखने के बाद 3. एक दिन गली में मैंने मौत को देखा था। व‍ह बिल्‍कुल उस जिंदगी जैसी है जो जिंदगी मैं तुम्‍हारे बिना जी रहा हूं। 4. अगर तुम किसी उस औरत से प्‍यार करते हो जो औरत तुम्‍हे प्‍यार न करती हो उस समय ही एक ही इमानदार बात हो सकती है कि तुम दूर चले जाओ दूसरे शहर में, दूसरे देश में, दूसरी दुनिया में कहीं भी चले जाओ। पर जिंदगी का वास्‍ता है, चले जाओ। तुम चाहे पूरी तरह टूट जाओ पर ‘उसे’ न यह देखने देना। वह तुम्‍हे एक भिखारी बना क्‍यों देखे वह, जो तुममें एक बादशाह देख सकती थी। अगर मुझे अपनी सारी जिं...

राष्‍ट्रीय कवयित्री परिसंवाद- 2008

राष्‍ट्रीय कवयित्री परिसंवाद- 2008 बदाह, जिला-कुल्‍लू, हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश के पार्वती और व्‍यास नदी के संगम स्‍थल भून्‍तर-समशी, जिला कुल्‍लू, हिमाचल प्रदेश में दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कवयित्री परिसम्‍मेलन- 2008 महिला साहित्‍यकार संस्‍था एवं भारतीय साहित्‍य परिषद् की कुल्‍लू इकाई के सौजन्‍य से संपन्‍न हुआ। परिसम्‍मेलन का उद्घाटन वरिष्‍ठ साहित्‍यकार एवं केंद्रीय समाज कल्‍याण बोर्ड की पूर्व अध्‍यक्षा मृदुला सिन्‍हा ने किया। सम्‍मेलन में डॉ. अलका सिन्‍हा (दिल्‍ली), डॉ. श्रीमती उषा उपाध्‍याय (गुजरात), श्रीमती ममता वाजपेयी, डॉ. रमणिता शारदा, डॉ. निर्मला मौर्य, डॉ. विद्या शर्मा, श्रीमती विजय राजाराम, श्रीमती नारायणी शुक्‍ला, श्रीमती कनकलता, श्रीमती नलिनी पुरोहित ने शिरकत की। भारतीय साहित्‍य परिषद् की हिमाचल प्रदेश इकाई की तरफ से डॉ. रीता सिंह ने आए कवियों का स्‍वागत-सत्‍कार किया। “” परिसंवाद में तीन विषय तय किए गए। प्रथम “महिला लेखन का कल आज और कल” पर बोलते हुए मृदुला सिन्‍हा ने कहा कि आज पश्चिम में “मां” की पुन: परिभाषा ढूंढी जा रही है। मां के लिए भारतीय दृष्टिकोण ही सनातन, अर्वाचीन, और...

लिंकन और केनेडी : त्रासदी के साम्य

यह महज संयोग है या नियति का लेख! इस पर मुख्तलिफ ख्याल के लोगों की राय जुदा-जुदा हो सकती है. खैर, इसे खुद पढिये और अपनी राय कायम कीजिए. यह पोस्ट रेजेक्ट्माल ब्लौग से साभार लिया गया है. लिंकन और केनेडी दोनों अमेरिका के राष्ट्रपति थे. दोनों को इतिहास मे महान राष्ट्रपति का दर्जा हासिल है. इसके अलावा भी दोनों मे समानताएं थीं? कितनी? अंदाजा लगा सकते हैं? नहीं तो नीचे की पंक्तियाँ पढिये. दैनिक भास्कर (२९ अप्रिल) के अपने दैनिक स्तंभ मे एन रघुरामन ने एक ईमेल के हवाले से इन समानताओं का जिक्र किया है. ये दिलचस्प जानकारियाँ आप सबके साथ शेयर करने के लिए हम यहाँ दे रहे हैं. अब्राहम लिंकन को १८४६ मे कांग्रेस के लिए चुना गया था. जॉन एफ कैनेडी को १९४६ मे कांग्रेस के लिए चुना गया था. अब्राहम लिंकन को १८६० मे राष्ट्रपति चुना गया था. जॉन एफ कैनेडी को १९६० मे राष्ट्रपति चुना गया था. दोनों विशेष रूप से नागरिक अधिकारों के लिए चुने गए थे. दोनों की पत्नियों ने व्हाइट हाउस मे रहते हुए एक बच्चा खोया था. दोनों को शुक्रवार के दिन गोली मारी गयी थी. दोनों को सिर मे गोली मारी गयी थी. लिंकन के सचिव का उपनाम केनेडी था...

मैनें भी देखे हैं भूत-प्रेत और जिन्न

राजीव रंजन एक पत्रकार मित्र हैं पूजा और उनका ब्लौग है तीन बिंदु . उन्होंने अपने ब्लौग पर एक पोस्ट डाली है, जिसमें एक खबर के हवाले से बताया गया है कि बिहार और झारखण्ड के कुछ इलाकों में ऐसे मेले लगते हैं जिनमें लोगों के भूत उतारे जाते हैं, खासकर औरतों के. पूजा ने इस पर सवाल उठाए हैं जो वाजिब भी हैं. उनका कहना है कि यह एक प्रकार का अत्याचार है, अंधविश्वासों की आड़ में औरतों का शोषण है. भूत भगाने की इस निर्मम और गर्हित प्रक्रिया का मैं बहुत नजदीक से गवाह रहा हूँ. इस तरह का एक बडा मेला ( नवरात्रों में ) मेरे गाँव भुतहा खैरा से आधा किलोमीटर की दूरी पर लगता है. जगह का नाम है घिनऊ ब्रह्म. यह बिहार के रोहतास जिले के बिक्रमगंज अनुमंडल में स्थित है. यहाँ आसपास के इलाके की महिलायें और पुरुष आते हैं, जो "प्रेत बाधा से पीड़ित" होते हैं. वैसे ज्यादातर संख्या महिलाओं की ही होती है. बडा वीभत्स दृश्य होता है. में जब भी गाँव जाता था, मेरी आजी ( दादी ) उन रास्तों पर चलने से मना करती थी, जिन पर "प्रेत बाधा से पीड़ित" लोगो के सामान फेकें हुए रहते थे. उन सामानों में रिबन, टिकुली ( ...

निराला जी की कविता

बांधो न नाव इस ठांव बन्धु पूछेगा सारा गांव बन्धु यह घाट वही जिस पर हंस कर वह नहाती थी कभी धंस कर आँखें रह जाती थीं फंस कर कांपते थे दोनों पांव बन्धु बांधो न नाव इस ठांव बन्धु पूछेगा सारा गांव बन्धु वह हंसी बहुत कुछ कहती थी फिर भी अपने में रहती थी सबकी सुनती थी सहती थी देती थी सबमे दांव बन्धु बांधो न नाव इस ठांव बन्धु पूछेगा सारा गांव बन्धु

दरमियाँ

मख्मूर सईदी कितनी दीवारें उठी हैं एक घर के दरमियाँ घर कहीं गुम हो गया है दीवारो-दर के दरमियाँ एक साअत थी कि सदियों तक सफर करती रही कुछ ज़माने थे कि गुज़रे लम्हे भर के दरमियाँ वार वो करते रहेंगे, ज़ख्म हम सहते रहें है यही रिश्ता पुराना संग-ओ-सर के दरमियाँ किसकी आहट पर अंधेरों के कदम बढ़ते गए? रहनुमा था कौन इस अंधे सफर के दरमियाँ बस्तियां 'मख्मूर' यूं उजड़ी कि सहरा हो गईं फासले बढ़ने लगे जब घर से घर के दरमियाँ साअत- क्षण संगो-सर- पत्थर और सर