खत्म हो रहा है सब!

राजीव रंजन खेत, खेत नहीं रहे नदी, नदी नहीं रही पहाड़ अब पहाड़ नहीं रहे हवा भी हवा नहीं रही, और जंगल तो शायद रहे ही नहीं। खेत अब भूख बन गए हैं नदी अब बाढ़ हो गई पहाड़ बौने और विधवा की मांग जैसे हवा जहरीली हो गई है इन दिनों सांस फूलने लगती है जंगल अब अपार्टमेंट हो गए हैं। क्योंकि आदमी अब आदमी नहीं रहा जबकि सबके होने के लिए आदमी का होना जरूरी था बहुत जरूरी।