संदेश

सिरा

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राजीव रंजन छूट गए बातचीत के सिरे को कोशिश करता हूं फिर से पकड़ने की। कहता हूं इस साल मौसम बहुत गर्म है हालांकि कहना चाहता था तुम कैसी हो। कहता हूं धरती तप रही है खेत सूने पड़े हैं हालांकि कहना चाहता था जीवन खाली-सा हो गया है। कहता हूं बारिश ने बहुत देर कर दी आने में हालांकि कहना चाहता था मैं प्रतीक्षा में था कि तुम आओगी। कहता हूं शायद इस बार जाड़ा भी कसके पड़ेगा हालां‍कि कहना चाहता था मेरे बिन कैसे बीते दिन तुम्हारे। कहता हूं प्रकृति इतनी कठोर तो नहीं थी पहले हालांकि कहना चाहता था भूल गई तुम मुझे बिल्कुल ही। कहता हूं अब मौसमों का कोई ईमान नहीं रहा हालांकि कहना चाहता था तुम भी तो कितना बदल गई। वह कहती है हवा पानी और जमीन सब दूषित हो गए हैं ओजोन परत में छेद हो गई है ऑस्ट्रेलिया जितनी महासगर में अल-नीनो खेल रहा है मौसमों से खेल इसलिए जाड़ा गर्मी बरसात का कोई ठिकाना नहीं रहा अब सोचता हूं उसने जो कहा शायद वही कहना चाहती थी। बातचीत का सिरा हाथ में आकर भी पकड़ में नहीं आता।

मूवी रिव्‍यू: क्‍लब 60

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राजीव रंजन आपकी एक दुनिया है, जिसमें आप अपनी खुशियों के साथ जीते हैं और अचानक एक दिन आपकी उस दुनिया का सिरा आपके हाथ से छूट जाता है। फिर दुनिया बेमानी लगने लगती है, जीवन के रंग मटमैले हो जाते हैं, जीने की इच्छा की समाप्त हो जाती है और आप मर भी नहीं पाते। एक अजीब-सी त्रासदी है, जिसमें रोज-रोज मरना पड़ता है। दिमाग कहता है कि मरने वालों के साथ मरा नहीं करते, लेकिन जिंदगी का कोई सिरा हाथ ही नहीं आता। और एक दिन अचानक कोई ऐसा टकरा जाता है, जो जीने की ललक जगाने में कैटेलिस्ट का काम करता है और धीरे-धीरे ही सही जिंदगी अपनी रौ में लौटने लगती है। डॉ. तारिक शेख (फारुक शेख) और सायरा शेख (सारिका) का बेटा पढ़ने के लिए अमेरिका जाता है और वहां एक सिरफिरे द्वारा की गई गोलीबारी में मारा जाता है। अपने इकलौते बेटे की मौत से मियां-बीवी टूट जाते हैं और अपना सब कुछ बेच कर पुणे से मुम्बई आ जाते हैं। सायरा तो इस गम को झेल लेती हैं और जिंदगी को जीने की कवायद शुरू कर देती हैं, लेकिन तारिक का जिंदगी से लगाव खत्म हो जाता है। वह एक्यूट डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं और एक बार तो अपनी जान देने की कोशिश करते हैं। तारि...

मूवी रिव्यू: डेढ़ इश्किया

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राजीव रंजन इधर सीक्वल के नाम पर ज्यादातर बनी फिल्मों का पिछली कहानी से कोई लेना-देना नहीं होता था, बस हिट फिल्मों के नाम को भुनाने की कोशिश भर होती थी। ‘डेढ़ इश्किया’ उस परिपाटी को तोड़ती है। दो चोर हैं- इफ्तिखार यानी खालू जान (नसीरुद्दीन शाह) और बब्बन (अरशद वारसी)। खालूजान शायराना तबीयत के चोर हैं। बब्बन ठेठ देसी आदमी है, जिसके लिए इश्क का मतलब सेक्स है। एक हैं महमूदाबाद की बेगम पारा (माधुरी दीक्षित नेने), जिनके नवाब मियां अपनी शाहखर्ची की वजह से उन्हें मुफलिसी में छोड़ दुनिया से कूच कर जाते हैं। बेगम की एक हमदर्द है मुनिया (हुमा कुरेशी), जो बहुत स्मार्ट है। एक हैं जान मोहम्मद (विजय राज), जिनके पास दौलत, पावर सब कुछ है, लेकिन वह चाहते हैं नवाब बनना। बेगम पारा मुनिया की मदद से महमूदाबाद में एक स्वयंवर टाइप का आयोजन करती हैं, ताकि अपनी बाकी की जिंदगी के लिए शौहर चुन सकें। बेगम पारा को अपनी बेगम बनाने के लिए कई नवाब इस स्वयंवर में जुटते हैं तथा अपनी शेरो-शायरी और दूसरे हुनर से बेगम को रिझाने की कोशिश करते हैं। इस दौड़ में खालूजान और जान मोहम्मद भी शामिल हो जाते हैं। खालू के पीछे-पीछे ...

फिल्म रिव्यू: शोले 3 डी

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राजीव रंजन शोले भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी फिल्म है, जिसका जादू कभी फीका नहीं पड़ा। इस फिल्म के बारे में कहा जाता है कि जो सिनेमा में हो सकता है, वह सब ‘शोले’ में है और जो शोले में नहीं है, वह सिनेमा में हो ही नहीं सकता। यह फिल्म एक ऐसा सिनेमाई व्यंजन है, जिसमें मनोरंजन के सारे मसाले- ड्रामा, एक्शन, कॉमेडी, इमोशन, डांस, डायलॉग, गीत-संगीत सही मात्रा और अनुपात में हैं। वहीं फिल्म मेकिंग का क्राफ्ट भी परफेक्ट है। सधा निर्देशन, शानदार सिनेमेटोग्राफी, कसी स्क्रिप्ट, बेहतरीन एडिटिंग व फिल्म के मिजाज के अनुकूल लोकेशन। और हां, स्टार कास्ट की तो बात ही क्या! करीब 39 साल बाद ‘शोले’ एक बार फिर दर्शकों के सामने है, एक नए अवतार-3डी में। मूल फिल्म के दृश्यों से छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिल्म की लंबाई वही है- 207 मिनट। नए अवतार में फिल्म का प्रभाव बढ़ गया है। कई दृश्य पहले के मुकाबले ज्यादा इफेक्ट डालते हैं। कास्टिंग में उड़ती तितलियां प्यारी लगती हैं। खास कर एक्शन दृश्यों में 3डी का इफेक्ट रोमांचक है। फिल्म के शुरू में डकैत मालगाड़ी को रोकने के लिए लकड़ियों का गट्ठर पटरियों पर रखते हैं और...

कुछ रीत जगत की ऐसी है, हर एक सुबह की शाम हुई

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राजीव रंजन बात बहुत पहले की है। सन् 1985, 86 या 87 या इसके आसपास का कोई समय। पक्‍का याद नहीं। उम्र यही कोई 10 या 12 साल की, तब फिल्‍मों से ताल्‍लुक बढ़ने लगा था। तब जमाना अमिताभ बच्‍चन का था। राजेश खन्‍ना का रुतबा काफी पहले ढल चुका था और अमिताभ का एकच्‍छत्र राज था। कभी-कभार बड़ो से, खासकर पिताजी से राजेश खन्‍ना के बारे में सुनने को मिलता था। उनके स्‍टारडम के बारे में, उनके एटिट्युड के बारे में। अमिताभ से प्रतिद्वंद्विता के बारे में। जमाना अमिताभ का था और हमारे लिए हीरो का मतलब था अमिताभ बच्‍चन। यही वजह थी कि राजेश खन्‍ना के प्रति मन से नफरत टाइप-सी होने लगी। उनका समय भी ढल गया था, फिल्‍में भी ऐसी कोई देखी नहीं थी उनकी, जिनमें वो अपने पूरे शवाब पर हों। जो देखी थीं, वे सब साधारण-सी, जिनमें कुछ भी ऐसा नहीं था, जो एक बड़े होते बच्‍चे को लुभा सके। हालांकि पापा कहते थे कि बहुत अच्‍छे एक्‍टर थे वो, पर हम नहीं मानते थे। कुछ साल गुजर गए। हमारे घर टीवी आ गया था। ‘आनंद’ देखी, अभिभुत हो गया। राजेश खन्‍ना से, अमिताभ से तो पहले से ही था। फिर ‘नमक हराम’ देखने का मौका मिला, राजेश खन्‍ना दिल में बस ग...

खत्‍म हो रहा है सब!

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राजीव रंजन खेत, खेत नहीं रहे नदी, नदी नहीं रही पहाड़ अब पहाड़ नहीं रहे हवा भी हवा नहीं रही, और जंगल तो शायद रहे ही नहीं। खेत अब भूख बन गए हैं नदी अब बाढ़ हो गई पहाड़ बौने और विधवा की मांग जैसे हवा जहरीली हो गई है इन दिनों सांस फूलने लगती है जंगल अब अपार्टमेंट हो गए हैं। क्‍योंकि आदमी अब आदमी नहीं रहा जबकि सबके होने के लिए आदमी का होना जरूरी था बहुत जरूरी।

क्‍या लिखूं?

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राजीव रंजन क्‍या लिखूं? वक्‍त इफरात में है और कलम में रोशनाई भी बहुत मगर दिल रोशन नहीं है क्‍या लिखूं? ये बरस भी गुजर गया कई और बरसों की तरह कई भरते जख्‍मों को हरा करके तो कुछ नए जख्‍म देके कुछ खुशियों के छीटें भी पड़े, पर ऐसे कि तपते रेगिस्‍तान में खो जाती हैं पानी की बूंदें जैसे। लिखने को तो वैसे लिख सकता हूं आफताब से भी ज्‍यादा सुर्ख घरों की दास्‍तान माहताब से भी ज्‍यादा रोशन चेहरों की चमक पर बीच में आ जाते हैं करोंड़ों तारीक़ मंज़र। लिखने को तो लिख सकता हूं आवाज की रफ्तार से भी तेज दौड़ते ‘कामयाब’ कदमों की कहानी पर याद आ जाती हैं कई कहानियां फंसी हैं जो अंतहीन अंधेरे सुरंगों में अपने अंत के इंतजार में। लिखने को तो बहुत कुछ है, लेकिन कई ‘लेकिन’ बीच में आ जाते हैं। ये अंधेरा हर तरफ है या मैं ही डूबा हुआ हूं अंधेरों में?