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खत्‍म हो रहा है सब!

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राजीव रंजन खेत, खेत नहीं रहे नदी, नदी नहीं रही पहाड़ अब पहाड़ नहीं रहे हवा भी हवा नहीं रही, और जंगल तो शायद रहे ही नहीं। खेत अब भूख बन गए हैं नदी अब बाढ़ हो गई पहाड़ बौने और विधवा की मांग जैसे हवा जहरीली हो गई है इन दिनों सांस फूलने लगती है जंगल अब अपार्टमेंट हो गए हैं। क्‍योंकि आदमी अब आदमी नहीं रहा जबकि सबके होने के लिए आदमी का होना जरूरी था बहुत जरूरी।

क्‍या लिखूं?

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राजीव रंजन क्‍या लिखूं? वक्‍त इफरात में है और कलम में रोशनाई भी बहुत मगर दिल रोशन नहीं है क्‍या लिखूं? ये बरस भी गुजर गया कई और बरसों की तरह कई भरते जख्‍मों को हरा करके तो कुछ नए जख्‍म देके कुछ खुशियों के छीटें भी पड़े, पर ऐसे कि तपते रेगिस्‍तान में खो जाती हैं पानी की बूंदें जैसे। लिखने को तो वैसे लिख सकता हूं आफताब से भी ज्‍यादा सुर्ख घरों की दास्‍तान माहताब से भी ज्‍यादा रोशन चेहरों की चमक पर बीच में आ जाते हैं करोंड़ों तारीक़ मंज़र। लिखने को तो लिख सकता हूं आवाज की रफ्तार से भी तेज दौड़ते ‘कामयाब’ कदमों की कहानी पर याद आ जाती हैं कई कहानियां फंसी हैं जो अंतहीन अंधेरे सुरंगों में अपने अंत के इंतजार में। लिखने को तो बहुत कुछ है, लेकिन कई ‘लेकिन’ बीच में आ जाते हैं। ये अंधेरा हर तरफ है या मैं ही डूबा हुआ हूं अंधेरों में?

विजेंद्र अनिल की कविता 'हमरो सलाम लीहीं जी'

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विजेंद्र अनिल संउसे देसवा मजूर, रवा काम लीहीं जी रउवा नेता हईं, हमरा सलाम लीहीं जी रउवा गद्दावाली कुरुसी प बइठल रहीं जनता भेंड़-बकरी ह, ओकर चाम लीहीं जी रउवा पटना भा दिल्ली बिरजले रहीं केहु मरे, रउवा रामजी के नाम लीहीं जी चाहे महंगी बढ़े, चाहे लड़े रेलिया रउवा होटल में छोकरियन से जाम लीहीं जी केहू कछुओ कहे त महटिउवले रहीं रउवा पिछली दुअरिया से दाम लीहीं जी ई ह गांधी के देस, रउवा होई ना कलेस केहू कांपऽता त कांपे, रउआ घाम लीहीं जी।

डॉ. राही मासूम रजा की कविता ''मरसिया''

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मरसिया एक चुटकी नींद की मिलती नहीं अपने जख्‍मों पर छिड़कने के लिए हाय हम किस शहर में मारे गए। घंटियां बजती हैं जीने पर कदम की चाप है फिर कोई बेचेहरा होगा मुंह में होगी जिसके मक्‍खन की जुबां सीने में जिसके होगा एक पत्‍थर का दिल मुस्‍करा कर मेरे दिल का एक वरक ले जाएगा हाय हम किस शहर में मारे गए।

राही मासूम रजा की कविता 'वसीयत'

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वसीयत वसीयत क्‍या करूं आखिर न जाने मौत किस आलम आयेगी किसे मालूम वो मुख्‍तार (स्‍वच्‍छंद) या मजबूर आयेगी किसे मालूम हंसती-खेलती आयेगी या जख्‍मों से बिल्‍कुल चूर आयेगी वतन में- या वतन से दूर आयेगी वसीयत क्‍या करूं- किससे करूं आखिर बहुत मुमकिन है जिसके हाथ में ये दास्‍तां आये वो मेरी इस जुबां ही से वा‍किफ न हो! तो फिर आखिर वसीयत क्‍या करूं-किससे करूं आखिर सुना है मौत का एक दिन मुअय्यन (निश्चित) है-तो फिर होगा किसे परवा ... और ये दुनिया- ड्राइंगरूमों, कहवाखानों और बेजान मयखानों की ये दुनिया मुझे बिल्‍कुल भूला ही दे तो अच्‍छा है कि मेरी दास्‍तां में न जाने कितनी बार उसका नाम आयेगा कि मुझको और मेरे फन को डंसा है इन पुरानी नागिनों ने कहवाखानों और ड्राइंगरूमों की इन सालखुर्दा (वयोवृद्ध) नागिनों ने रूप में इन्‍सान के आकर मेरा फन मर गया, यारो मैं नीला पड़ गया यारो मुझे ले जाके गाजीपुर में गंगा की गोदी में सुला देना वो मेरी मां है वो मेरे बदन का जहर पी लेगी हजारों बार मुझको खो चुकी है वो मुझे खोकर वो फिर इक बार जी लेगी वो मेरी मां है वो मेरे बदन का जहर पी लेगी मगर शायद वतन से दूर मौत आये बहुत ही ...

अनुभूति

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राजीव रंजन तुमको, छूआ नहीं जा सकता देखा नहीं जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है क्‍योंकि तुम तो अनुभूति मात्र हो. तुमको, पाकर भी साथ निभाया नहीं जा सकता क्‍योंकि तुम तो रेत की तरह हो, जो मुट्ठियों से फिसल जाती है और पैरों तले से सरक जाती है.

गुजरे दिन कभी गुजरे नहीं

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राजीव रंजन गुजरे दिन कभी गुजरे नहीं हालात जो थे सुधरे नहीं. पिरो कर रखता हूं सीने में यादों के मोती बिखरे नहीं. ताउम्र चलते रहे यूं ही थक गए, मगर ठहरे नहीं. सच को हर कदम पर कैद है झूठ पर कोई पहरे नहीं. सब कुछ है धुंधला-धुंधला सा पहचाने से कोई चेहरे नहीं.

पत्रकारिता हमारी ढाल है और साहित्‍य आड़

राजीव रंजन हमें गुमान है कि हम लोकतंत्र के चौथे खंभे की ईंट और गारे हैं. हमें यह भी गुमान है कि हम लोगों की आवाज हैं ये बात और है कि हमारी ही आवाज बेमौत मर जाती है या यूं कहें, हम ही खुद घोट देते हैं उसका गला. हम सिर्फ नौकरी करते हैं हमारी एकमात्र चिंता है नौकरी बची रहे चाहे कुछ और बचे न बचे. जब हम पर कोई सवाल उठाता है हम उछाल देते हैं उस पर ही कई सवाल. हम पापी पेट की दुहाई देकर न जाने कितने पाप चुपचाप देखते रहते हैं. हम पापी पेट के नाम पर हर रोज न जाने कितने पाप करते रहते हैं और इन सारे ‘पापबोधों’ से मुक्‍त होने के लिए कविता लिख देते हैं. पत्रकारिता हमारी ढाल है साहित्‍य हमारी आड़। (28/12/2006)

बदलते मौसम की उदासी!

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राजीव रंजन इस दो दरवाजे वाले किराये के कमरे में हर चीज अपनी जगह से है कुछ तरतीब से रखी हुई और कुछ बेतरतीब सी करीने से तह करके टीन के बक्‍से में रखे कपड़े रेक पर सजी हुईं किताबें बिस्‍तर पर बिखरे धुले हुए कपड़े फैले अखबार रिसाले और किताबें छत से लटकता हुआ पंखा सन्‍नाटे को तोड़ता हुआ सन्‍नाटे को बढ़ाता हुआ याद आती शरद ऋतु में जेठ में बजती गांव की खामोशी यह बदलते मौसम की उदासी है या दिल ही है कुछ खोया-खोया सा। (3/10/2006)

मुक्तिबोध की कविता

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घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, निस्तब्ध वनंतर व्यापक अंधकार में सिकुड़ी सोयी नर की बस्ती भयकर है निस्तब्ध गगन, रोती-सी सरिता-धार चली गहराती, जीवन-लीला को समाप्त कर मरण-सेज पर है कोई नर बहुत संकुचित छोटा घर है, दीपालोकित फिर भी धुंधला, वधू मूर्छिता, पिता अर्ध-मृत, दुखिता माता स्पंदन-हीन घनी रात, बादल रिमझिम हैं, दिशा मूक, कवि का मन गीला “ये सब क्षनिक, क्षनिक जीवन है, मानव जीवन है क्षण-भंगुर” क्षण-भंगुरता के इस क्षण में जीवन की गति, जीवन का स्वर दो सौ वर्ष आयु होती तो क्या अधिक सुखी होता नर? इसी अमर धारा के आगे बहने के हित ये सब नश्वर, सृजनशील जीवन के स्वर में गाओ मरण-गीत तुम सुंदर तुम कवि हो, यह फैल चले मृदु गीत निर्बल मानव के घर-घर ज्योतित हों मुख नवम आशा से, जीवन की गति, जीवन का स्वर ‘गजानन माधव मुक्तिबोध’

... इसलिए उदास हो जाता हूं

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राजीव रंजन कई बार उदास हो जाने को जी चाहता है कई बार उदासी बड़ी अच्‍छी लगती है कई बार दिन भर की चहल-पहल से उब कर जीने की जद्दोजहद में घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक के सफर से थक जाने के बाद बत्तियां बुझाकर चुपचाप लेट जाना अतीत की राहों पर चलना गुजरे लम्‍हों को फिर से गुनना और बीते वक्‍त को जी कर उदास हो जाना अच्‍छा लगता है जिंदगी का हासिल खुशी ही नहीं है कभी-कभी उदासी भी आदमी को जिंदा कर देती है। इसलिए कई बार उदास हो जाता हूं।

वीणा-वादिनी वर दे

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सूर्यकान्‍त त्रिपाठी 'निराला' वर दे वीणा-वादिनी वर दे। प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे। काट अंध उर के बंधन स्तर बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर कलुष भेद तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे। वर दे वीणा-वादिनी वर दे... नव गति नव लय ताल-छंद नव नवल कंठ नव जलद मंद्र रव नव नभ के नव विहग वृंद को नव पर नव स्वर दे। वर दे वीणा-वादिनी वर दे...

राष्‍ट्रीय कवयित्री परिसंवाद- 2008

राष्‍ट्रीय कवयित्री परिसंवाद- 2008 बदाह, जिला-कुल्‍लू, हिमाचल प्रदेश हिमाचल प्रदेश के पार्वती और व्‍यास नदी के संगम स्‍थल भून्‍तर-समशी, जिला कुल्‍लू, हिमाचल प्रदेश में दो दिवसीय राष्‍ट्रीय कवयित्री परिसम्‍मेलन- 2008 महिला साहित्‍यकार संस्‍था एवं भारतीय साहित्‍य परिषद् की कुल्‍लू इकाई के सौजन्‍य से संपन्‍न हुआ। परिसम्‍मेलन का उद्घाटन वरिष्‍ठ साहित्‍यकार एवं केंद्रीय समाज कल्‍याण बोर्ड की पूर्व अध्‍यक्षा मृदुला सिन्‍हा ने किया। सम्‍मेलन में डॉ. अलका सिन्‍हा (दिल्‍ली), डॉ. श्रीमती उषा उपाध्‍याय (गुजरात), श्रीमती ममता वाजपेयी, डॉ. रमणिता शारदा, डॉ. निर्मला मौर्य, डॉ. विद्या शर्मा, श्रीमती विजय राजाराम, श्रीमती नारायणी शुक्‍ला, श्रीमती कनकलता, श्रीमती नलिनी पुरोहित ने शिरकत की। भारतीय साहित्‍य परिषद् की हिमाचल प्रदेश इकाई की तरफ से डॉ. रीता सिंह ने आए कवियों का स्‍वागत-सत्‍कार किया। “” परिसंवाद में तीन विषय तय किए गए। प्रथम “महिला लेखन का कल आज और कल” पर बोलते हुए मृदुला सिन्‍हा ने कहा कि आज पश्चिम में “मां” की पुन: परिभाषा ढूंढी जा रही है। मां के लिए भारतीय दृष्टिकोण ही सनातन, अर्वाचीन, और...