धूमिल की कविता 'लोहे का स्वाद'
सुदामा पांडेय 'धूमिल' इसे देखो अक्षरों के बीच घिरे हुए आदमी को पढ़ो क्या तुमने सुना कि यह लोहे की आवाज है या मिट्टी में गिरे खून का रंग लोहे का स्वाद लोहार से मत पूछो घोड़े से पूछो जिसके मुंह में लगाम है।
हर जर्रा चमकता है अनवारे इलाही से। हर सांस ये कहती है हम हैं तो खुदा भी है।।