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पत्रकार और फिल्मकार विनोद कापरी से फिल्म "पिहू" पर बातचीत

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यह सिर्फ एक कहानी नहीं ,  बड़ा सामाजिक मुद्दा भी है: विनोद कापरी सिर्फ दो साल की एक बच्ची के साथ बनाई गई इकलौते किरदार वाली  ‘ सोशियो-थ्रिलर ’  फिल्म  ‘ पीहू ’  का ट्रेलर लोगों को काफी लुभा रहा है। इसकी प्रशंसा अमिताभ बच्चन और मनोज बाजपेयी जैसे बड़े अभिनेता भी कर चुके हैं। इस फिल्म का निर्देशन पत्रकार विनोद कापरी ने किया है। वह इससे पहले फिल्म  ‘ मिस टनकपुर हाजिर हो ’  का निर्देशन भी कर चुके हैं।  ‘ पीहू ’  को लेकर  राजीव रंजन  की  विनोद कापरी  से बातचीत: ‘ पीहू ’  बनाने का विचार मन में कैसे आया ? मेरे घर में एक डॉग है पिछले छह साल से। कई बार हम उसे काफी देर के लिए अकेले छोड़ कर चले जाते थे। तब मुझे ख्याल आता था कि वह बेजुबान जीव घर में अकेले कैसे रहता होगा। इसी तरह कई युवा दंपती हैं ,  जो नौकरी की वजह से अपने छोटे बच्चों को आया ,  नौकरानी के सहारे छोड़ कर चले जाते हैं। कई बार वो आया भी किसी काम के लिए बच्चों को अकेले छोड़ कर चली जाती हैं। मैं खुद कई ऐसे परिवारों को जानता हूं ,  जहां पति-पत्नी दोनों...

वक्त की बर्बादी है ‘ये इंतजार’

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राजीव रंजन कलाकार: अरबाज खान, सनी लियोने, आर्य बब्बर, गौहर खान, सुधा चंद्रन निर्देशक: राजीव वालिया संगीत: राज आशू रेटिंग- 1 स्टार ये फिल्म क्यों बनाई गई है और किसके लिए बनाई गई है, पूरी फिल्म देखने के बाद भी इसका उत्तर खोज पाना बड़ा कठिन है। ये क्राइम-थ्रिलर है या हॉरर है या रोमांटिक फिल्म है, यह भी तय कर पाना कठिन है। हालांकि फिल्म का शुरुआती का दृश्य थोड़ी-बहुत उत्सुकता जगाने वाला है, अविश्वसनीय होने के बावजूद। लेकिन उसके बाद सारी चीजें इतनी घिसी-पिटी होती हैं कि कोफ्त होने लगती है। वीर सिंह राजपूत (अरबाज खान) एक पेंटर है। वह अपनी ड्रीम गर्ल की तस्वीर बनाता है। जब तस्वीर पूरी हो जाती है तो उसे ठीक तस्वीर वाली लड़की दिखाई देती है। उस लड़की का नाम रौनक (सनी लियोने) है। वीर उसका पीछा करता है। रौनक एक आर्ट क्यूरेटर है। वीर उसकी गैलरी में अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी लगाना चाहता है। रौनक उससे कहती है कि गैलरी में सिर्फ एक्सक्लूसिव पेंटिंग लगााई जाती हैं। वीर उसे अपनी ड्रीम गर्ल वाली पेंटिंग दिखाता है। रौनक यह देख कर हैरान हो जाती है। फिर दोनों में प्यार हो जाता है। दोनों ‘तुम मेरा साथ...

निराश नहीं करती है सुलु

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राजीव रंजन कलाकार: विद्या बालन, मानव कौल, नेहा धूपिया, विजय मौर्य, अभिषेक शर्मा निर्देशक व लेखक: सुरेश त्रिवेणी ढाई स्टार (2.5 स्टार) एक अच्छी फिल्म वह होती है, जो अपने विषय, प्रस्तुतीकरण, सिनेमाई प्रभाव और कलाकारों के अभिनय की बदौलत शुरू से लेकर आखिर तक पटरी पर रहती है। एक सामान्य फिल्म वह होती है, जो काफी देर तक पटरी पर रहती है, लेकिन फिर पटरी से उतर जाती है। हालांकि वह दुबारा पटरी पर आती है, लेकिन तब तक अपना वह प्रभाव खो चुकी होती है, जो उसने शुरुआती क्षणों में पैदा किया था। विद्या बालन की ‘तुम्हारी सुलु’ दूसरी वाली श्रेणी में आती है। फिल्म के पहले हाफ में इसने जो ऊंचाई हासिल की थी, दूसरे हाफ में उसको बरकरार नहीं रख पाती और वहां से फिसल जाती है। यह कहानी है सुलोचना उर्फ सुलु (विद्या बालन) की, जो मुंबई के उपनगर विरार में रहती है। उसका एक छोटा-सा परिवार है, जिसमें पति अशोक (मानव कौल) और बेटा प्रणव (अभिषेक शर्मा) हैं। सुलु भी एक सामान्य गृहिणी है और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में जुटी रहती है, लेकिन उसके साथ ही उसमें ‘कुछ करने’ की तमन्ना भी जोर मारती रहती है। उ...

रुख: सबके लिए नहीं है यह कहानी

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राजीव रंजन फिल्म: रुख ढाई स्टार (2.5 स्टार) निर्देशक: अतनु मुखर्जी निर्माता: मनीष मुंद्रा कलाकार: मनोज बाजपेयी, आदर्श गौरव, स्मिता तांबे, कुमुद मिश्रा संगीत: अमित त्रिवेदी एक बात पहले ही साफ कर देनी जरूरी है कि ‘रुख’ वीकेंड पर एन्जॉय करने वाला सिनेमा नहीं है। जिस तरीके से इसे बनाया गया है, उससे जान पड़ता है कि इसे मास के लिए ध्यान में रख कर नहीं बनाया गया है। हालांकि फिल्म की जो कहानी है, उसमें तेज गति वाली एक सस्पेंस थ्रिलर की तमाम संभावनाएं मौजूद थीं, साथ ही भावनापूर्ण दृश्यों की भी काफी संभावना थी, लेकिन लेखक-निर्देशक अतनु मुखर्जी ने इस कहानी को अपने तरीके से कहने की कोशिश की है। यह फिल्म दिखाती है कि अपने परिवार के भविष्य की चिंता में कोई व्यक्ति कहां तक जा सकता है! दिवाकर माथुर (मनोज बाजपेयी) मुंबई में एक चमड़े का कारखाना चलाता है। उसकी फैक्ट्री संकट में है। वह अपने पार्टनर रोबिन (कुमुद मिश्रा) से पैसों का इंतजाम करने के लिए कहता है, लेकिन रोबिन उसे उधार लेकर काम चलाने को कहता है और कुछ समय बाद पैसों का बंदोबस्त करने का आश्वासन देता है। दिवाकर कहीं से उधार लेकर फैक्ट्री...

लखनऊ सेंट्रल: कलाकार अच्छे, कहानी कमजोर

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राजीव रंजन कलाकार: फरहान अख्तर, डायना पेंटी, रवि किशन, दीपक डोबरियाल, रोनित रॉय, राजेश शर्मा, जिप्पी ग्रेवाल, इनामुल हक, वीरेंद्र सक्सेना रेटिंग- 2.5 स्टार छोटे शहर के लोगों के बड़े सपने और उन सपनों के बीच आने वाली बाधाएं, उन बाधाओं पर जीत और अंतत: सपनों का साकार होना। इस थीम पर बॉलीवुड में कई फिल्में बनी हैं और उनमें से कुछ ने असर भी छोड़ा है। इसी कड़ी में बॉलीवुड की नई पेशकश है ‘लखनऊ सेंट्रल’। फिल्म के सह-लेखक व निर्देशक रंजीत तिवारी और लेखक असीम अरोड़ा ने एक ऐसी कहानी बुनने की कोशिश की है, जिसमें संजीदगी, मनोरंजन और रोमांच, सब पर्याप्त मात्रा में हो। उन्होंने इसे ‘मास’ और ‘क्लास’ दोनों के लिए बनाने की कोशिश की है, लेकिन चूक गए हैं। यह एक शुद्ध मसाला बॉलीवुड फिल्म बन कर रह गई है, जिसमें मसालों का चयन और अनुपात भी ठीक नहीं है। किशन मोहन गिरहोत्रा (फरहान अख्तर) उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का एक आम नौजवान है। वह गायक बनना चाहता है। अपना बैंड बनाना उसका सबसे बड़ा सपना है। वह अपनी सीडी रिकॉर्ड करता है और प्रसिद्ध गायक-अभिनेता मनोज तिवारी को सुनना चाहता है, जो उसके शहर में कंसर्ट के लिए ...

खोपड़ी से काम मत लो! फूट जाएगी

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‘पोस्टर बॉयज’ की समीक्षा राजीव रंजन 2.5 स्टार कलाकार: सन्नी देओल, बॉबी देओल, श्रेयस तलपड़े, सोनाली कुलकर्णी, समीक्षा भटनागर, अश्विनी कलसेकर, भारती अचरेकर निर्देशक: श्रेयस तलपड़े पिछले शुक्रवार ‘मर्दानगी’ से जुड़ी भ्रांतियों पर एक फिल्म आई थी ‘शुभ मंगल सावधान’। इस हफ्ते भी ऐसे ही विषय से जुड़ी एक और फिल्म आई है ‘पोस्टर बॉयज’, जो नसबंदी के बारे में बात करती है। लेकिन गंभीरता से नहीं, चलताऊ हंसी-मजाक के साथ। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे समाज में नसबंदी कराने वालों को ‘अच्छी नजर’ से नहीं देखा जाता। नसबंदी को ‘मर्दानगी बंदी’ के रूप में देखा जाता है। इस फिल्म का ताना-बाना इसी कथ्य के इर्द-गिर्द बुना गया है। एक गांव है जंगीठी, जो भाषा, भाव, माहौल के लिहाज से हरियाणा का कोई गांव लगता है। यहां रहते हैं रिटायर्ड फौजी जगावर सिंह (सन्नी देओल), स्कूल मास्टर विनय शर्मा (बॉबी देओल) और रिकवरी एजेंट अर्जुन सिंह (श्रेयस तलपड़े)। जगावर सेल्फी लेने के शौकीन है, मास्टर को कोई चीज बताते हुए बीच में ही भूल जाने की आदत है। अर्जुन को टशन झाड़ने की आदत है और वह रॉक स्टार के अंदाज़ में रहता है। उसके दो च...

‘अलीबाबा’ और ‘गुफा’ की रोचक दास्तान

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राजीव रंजन शुभ मंगल सावधान 3 स्टार कलाकार: आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, सीमा पाहवा, बृजेंद्र काला, सुप्रिया शुक्ला, अंशुल चौहान निर्देशक: आर.एस. प्रसन्ना हाल-फिलहाल कुछ ऐसी फिल्में आईं हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि शुष्क और नीरस हुए बगैर भी गंभीर मसलों पर बात की जा सकती है। एकदम मनोरंजक अंदाज में। ‘हिंदी मीडियम’, ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ इसका हालिया उदाहरण हैं। ‘शुभ मंगल सावधान’ भी ऐसी ही फिल्म है। यह ‘मर्दाना कमजोरी’ जैसे विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में उठाती है, जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता। मुदित शर्मा (आयुष्मान खुराना) गुड़गांव में रहता है। सुगंधा (भूमि पेडणेकर) दिल्ली के मोती बाग में रहती है। दोनों की राहें नेहरू प्लेस में टकराती हैं। मुदित को सुगंधा अच्छी लगती है। सुगंधा को भी मुदित अच्छा लगता है। लेकिन समस्या यह है कि मुदित यह बात बता नहीं पाता और सुगंधा चाहती है कि मुदित पहल करे। एक दिन वह दोस्तों के कहने पर हिम्मत जुटाता है और सुगंधा से अपनी भावनाओं का इजहार करने जाता ही है कि बीच में उसे भालू पकड़ लेता है। आखिरकार ...

दूर तक सूंघने वाला बच्चा जासूस

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राजीव रंजन 2 स्‍टार (दो स्‍टार) कलाकार: खुशमीत गिल, सुरेखा सीकरी, सुष्मिता मुखर्जी, राजेश पुरी, अमोल गुप्ते लेखक व निर्देशक: अमोल गुप्ते लेखक, अभिनेता और निर्माता-निर्देशक अमोल गुप्ते को बच्चों से विशेष प्यार है। अब तक उन्होंने बच्चों को केंद्र में रख कर ही अपनी फिल्मों का ताना-बाना बुना है। चाहे बतौर लेखक 'तारे जमीन' पर हो या बतौर लेखक-निर्देशक 'स्टेनली का डब्बा' और 'हवा हवाई', इन सभी फिल्मों के केंद्र में बच्चे हैं। ' ' का कथानक भी बच्चों के ईर्द-गिर्द ही बुना गया है। मुम्बई की एक सोसाइटी में रहने वाले बच्चे सन्नी गिल (खुशमीत गिल) के परिवार का अचार का बिजनेस है और इस व्यवसाय के लिए अच्छी घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) जरूरी है, लेकिन सन्नी सूंघ नहीं सकता। सन्नी की दादी (सुरेखा सीकरी) इससे बहुत चिंतित हैं। वह सन्नी का इलाज कराने के लिए हर जुगत भिड़ाती है, पर कामयाबी नहीं मिलती। एक बड़ा डॉक्टर बताता है कि सन्नी के नाक की एक नस बंद है, लिहाजा वह कभी सूंघ नहीं सकता। सन्नी की इस कमी का उसके क्लासमेट मजाक उड़ाते हैं। एक दिन सन्नी घूमते-घूमते अपने स्कूल...

नवाज के कंधों पर राजनीति, गालियों और गोलियों की बंदूक

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राजीव रंजन 2.5 स्टार (ढाई स्टार) निर्देशक : कुषाण नंदी कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विदिता बाग, जतिन गोस्वामी इन दिनों जब किसी फिल्म से नवाजुद्दीन सिद्दीकी का नाम जुड़ा होता है तो दर्शकों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। लेकिन उम्मीदें हर बार पूरी हों ही, यह जरूरी नहीं। चाहे कितना भी बड़ा भी कलाकार क्यों न हो, अकेले वह कमाल नहीं कर सकता। इसके ढेर सारे उदाहरण हैं। कुशान नंदी निर्देशित और नवाजुद्दीन स्टारर के साथ कुछ ऐसी ही है। इस फिल्म में कुषाण ने नवाज के कंधे पर बंदूक रख कर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का नया संस्करण रचने की कोशिश की है। उन्होंने गालियां भी खूब इस्तेमाल की हैं, हिंसा भी खूब करवाई है और सेक्स का तड़का भी लगाया है, लेकिन वह असर पैदा नहीं कर पाए हैं, जो ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में था। दरअसल फिल्म की पटकथा ढीली हो, प्रस्तुतीकरण में ताजगी न हो तो सारे मसाले होते हुए भी जायका जुबान पर नहीं चढ़ पाता। इस फिल्म में मसाले तो सारे हैं, लेकिन उनका कितना और कैसा इस्तेमाल किया जाए, इसे तय करने में निर्देशक कुषाण नंदी चूक गए। यही वजह है कि ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ एक बेहतर फिल्म होने की संभावना लिए हो...

रोमांस और कॉमेडी में पगी बरेली की बर्फी

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राजीव रंजन तीन स्टार पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड ने महानगरों के अलावा छोटे शहरों की कहानियों को भी प्रमुखता देनी शुरू कर दी है। दरअसल छोटे शहर की कहानियां और उनके किरदार एकरसता को तोड़ते हैं और दर्शकों को एक नए रस-रंग से रूबरू कराते हैं, अगर उन्हें ठीक तरीके से पेश किया जाता है तो। ‘बरेली की बर्फी’ भी एक ऐसी ही फिल्म है, जो उत्तर प्रदेश के छोटे शहर की पृष्ठभूमि में कही गई है। फिल्म के नाम से जाहिर ही है कि वह शहर बरेली है, जहां सालों पहले गिरे झुमके को दर्शक अब भी नहीं भूल पाए हैं। बॉलीवुड में बरेली ‘झुमके’ के लिए मशहूर है तो उत्तर भारत में यहां के बने बांस के फर्नीचर काफी मशहूर हैं। इसे बांस-बरेली भी कहते हैं। लेकिन बरेली का बर्फी से ऐसा क्या रिश्ता है, जिसके कारण बरेली को बर्फी से जोड़ कर फिल्म बनाई जाए! इसे जानने के लिए आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। ‘बरेली की बर्फी’ की कहानी बरेली की एक लड़की बिट्टी मिश्रा (कृति सैनन) की कहानी है, जो वर्जनाओं को नहीं मानती। वह सिगरेट पीती है, बिजली विभाग में नौकरी करती है, ब्रेक डांस करती है और जिन्दगी को खुल कर जीना चाहती है। अपनी सीमाओं में वह ब...

जब हैरी मेट सेजल: नई बोतल में प्रेम कहानी की पुरानी शराब

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2 स्टार कलाकार: शाहरुख़ खान, अनुष्का शर्मा लेखक व निर्देशक: इम्तियाज़ अली सिनेमेटोग्राफी: के. यू. मोहनन निर्माता: गौरी खान 'जब हैरी मेट सेजल' फिल्म के नाम और इम्तियाज अली, फिल्म के निर्देशक के नाम से यह तय-सा था कि यह भी एक प्रेम कहानी होगी। यहां तक तो कोई समस्या नहीं है। उम्मीद थी कि इम्तियाज यह प्रेम कहानी एक अलग अंदाज में परोसेंगे, जिसके लिए वह जाने जाते हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। यह फिल्म इम्तियाज की बहुत कम (बल्कि न के बराबर) और यशराज व धर्मा के स्टाइल की ज्यादा लगती है। फिल्म की कहानी एम्स्टर्डम से शुरू होती है। हैरी (शाहरुख खान) एक टूर गाइड है। वह गुजरात के एक हीरा व्यापारी के परिवार को यूरोप के विभिन्न देशों में घुमाता है। सेजल (अनुष्का शर्मा) उसी हीरा व्यापारी की बेटी है, जिसकी सगाई इसी टूर के दौरान एम्सटर्डम में होती है। उसकी सगाई की अंगूठी कहीं खो जाती है, जिसके चलते मंगेतर से उसका झगड़ा हो जाता है। वह अंगूठी ढूंढने के लिए रुक जाती है और हैरी को अपने साथ चलने के लिए मजबूर कर देती है। हैरी को मजबूरन उसका साथ देना पड़ता है। इस खोज के दौरान दोनों की मनोस्थि...

ये मुन्ना माइकल है और थोड़ा रैम्बो भी

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राजीव रंजन, नई दिल्ली स्टार- ढाई स्टार कलाकार: टाइगर श्रॉफ, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, निधि अग्रवाल, रोनित रॉय निर्देशक : शब्बीर खान माइकल जैक्सन ने अपने डांस से पूरी दुनिया में अनगिनत युवाओं को प्रेरित किया है। एमजे से प्रेरित होकर कई युवाओं ने डांस को अपना करियर बनाया। भारत में भी एमजे के दीवानों की कमी नहीं। अपने समय में बॉलीवुड के सबसे बड़े डांसिंग स्टार रहे मिथुन चक्रवती भी उनसे बहुत प्रभावित रहे हैं और उनके स्टेप्स करने की प्रैक्टिस भी किया करते थे। टाइगर श्रॉफ की ‘मुन्ना माइकल’ की प्रेरणा भी एमजे ही हैं। बस इसमें थोड़ा ‘रैम्बो’ को भी मिला दिया गया है। माइकल (रोनित रॉय) एक डांसर है, जो फिल्मों में ग्रूप डांस करता है। वह माइकल जैक्सन का बहुत बड़ा फैन है। एक दिन उसे काम से निकाल दिया जाता है, क्योंकि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। उसी रात उसे एक लावारिस शिशु रास्ते में पड़ा मिलता है। माइकल बच्चे का नाम मुन्ना रखता है और उसे घर ले आता है। मुन्ना डांस से दीवानगी की हद तक प्यार करता है। वह अपने दोस्तों के साथ क्लब वगैरह में डांस की शर्त जीत कर पैसे कमाता है। मुन्ना के बाबा को एक गंभीर बीम...

बहुत प्यारा सा है ये जग्गा जासूस

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राजीव रंजन 3 स्‍टार कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी निर्देशक: अनुराग बसु संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती एक कहावत है ‘देर आए दुरुस्त आए'। अनुराग बसु निर्देशित फिल्म ‘जग्गा जासूस’ पर ये कहावत सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद ठीक बैठती है। अनुराग की ये रणबीर कपूर-कैटरीना कैफ स्टारर फिल्म काफी समय से लटकी हुई थी, कई बार इसकी रिलीज की तारीखें बदली। एक समय तो ऐसा भी लगने लगा था कि यह फिल्म थियेटरों का मुंह देख भी पाएगी कि नहीं। बहरहाल, यह साफ कर देना ठीक रहेगा कि भले ही इसके नाम में जासूस शब्द जुड़ा है, लेकिन यह पारम्परिक जासूसी फिल्मों जैसी नहीं है। ऐसा लगता है, अनुराग ने इस फिल्म को बच्चों को ध्यान में ज्यादा रख कर बानाया है। फिल्म की शुरुआत दिसंबर, 1995 के बहुचर्चित पुरुलिया हथियार कांड के संदर्भ से शुरू होती है और फिल्म का मूल विषय हथियारों की तस्करी से जुड़ा है लेकिन इसका प्रस्तुतीकरण एक आम जासूसी थ्रिलर जैसा नहीं है। जग्गा (रणबीर कपूर) जन्म से अनाथ है और उसका लालन-पालन अस्पताल में होता है। उसी अस्पताल में एक दिन बादल बागची उर्फ टूटी फूटी (शाश्वत चटर्जी) भी भर्ती होत...

मैम से मॉम का सफर और प्रतिशोध

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राजीव रंजन नया क्या है? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे हम बारहां रूबरू होते हैं। फिल्म ‘मॉम’ के मुताल्लिक ये सवाल किया जाए तो जवाब है- कुछ भी नया नहीं है। लेकिन... लेकिन... यहीं पर यह बात भी तो आती है... आप क्या कहते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरह कहते हैं। और इस कसौटी पर मॉम काफी हद तक खरी उतरती है। रुटीन कहानी होने के बावजूद यह फिल्म अपने प्रस्तुतीकरण की वजह से ज्यादातर समय बांधे रखती है। फिल्म की शुरुआत स्कूल के दृश्य से होती है। देवकी (श्रीदेवी) बायोलॉजी की टीचर है। उसकी क्लास में उसकी सौतेली बेटी आर्या (सजल अली) भी है, जिसे उसका क्लासमेट मोहित भद्दे मैसेज करता है। देवकी उसका मोबाइल फेंक देती है। आर्या को देवकी अपनी बेटी मानती है, लेकिन देवकी को आर्या अपनी मां नहीं मानती। उसे मां की बजाय मैम कहती है। उसे लगता है कि उसके पिता आनंद सब्बरवाल (अदनान सिद्दीकी) उसकी मां को भूल गए हैं। उसे जाने-अनजाने लगता है कि ऐसा देवकी की वजह से हुआ है। लिहाजा वह देवकी की बेटी को तो स्वीकार कर लेती है, लेकिन देवकी को स्वीकार नहीं कर पाती। रिश्तों की इसी खींचतान के बीच एक दिन आर्या अपने ...

मंटो की कहानियों जैसी तासीर नहीं पैदा कर पाती 'मंटोस्तान'

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राजीव रंजन बंटवारे की स्याह हकीकत को अगर किसी ने सबसे ज्यादा प्रामाणिकता के साथ अपनी कहानियों में बयां किया है तो वह हैं सआदत हसन मंटो। उनकी कहानियों में बंटवारे के समय के हालात, लोगों की बेचारगी, लोगों की दरिंदगी इस नंगे और तल्ख रूप में सामने आती है कि रूह बेचैन हो जाती है। उनकी कहानियां एक बार पढ़ने के बाद हमेशा के लिए जेहन में बस जाती है। मंटो की कहानियों की तासीर ही ऐसी है कि वे पढ़ने वाले को झकझोर कर रख देती है। कभी-कभी तो लगता है कि उनके लेखन में इतनी तल्खी क्यों भरी है। इस सवाल का मंटो इन शब्दों में जवाब देते हैं- ‘जमाने के जिस दौर से हम इस वक्त गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां है, वो इस अहद (समय) की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर (रचना) में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स (त्रुटि) को मेरे नाम से मंसूब (संबंधित) किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम (व्यवस्था) का नुक्स है- मैं हंगामा पसंद नहीं। मैं लोगों के खयालातों-जज्बात में हैजान (अशांति) पैदा करना नहीं च...

भय का माहौल रचने में नाकाम 'दोबारा'

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राजीव रंजन आप किसी फिल्म के बारे में यह सोच कर जाते हैं कि वह एक हॉरर फिल्म है, और पूरे समय यह इंतजार करते रह जाते हैं कि बदन में झुरझुरी अब होगी, अब होगी। अब रोंगटे खड़े होंगे, लेकिन अंत तक ऐसा होता नहीं और आखिर आप ठगा हुआ-सा महसूस करते हुए सिनेमाहॉल से बाहर आ जाते हैं। 'दोबारा: सी योर ईविल' दर्शकों के साथ ऐसा ही बर्ताव करती है। बस एकाध सीन अपवाद के रूप में मान सकते हैं। 'दोबारा' 2014 में आई हॉलीवुड फिल्म 'ऑक्यूलस' का हिंदी रीमेक है और इसके निर्देशक माइक फ्लैनेगन 'दोबारा' से कार्यकारी निर्माता के रूप में जुड़े हुए हैं। फिल्म का पूर्वाद्र्ध बहुत धीमा है। उत्तराद्र्ध कुछ उम्मीद जगाता है, लेकिन निर्देशक घटनाओं को असरकारक तरीके से पेश नहीं कर पाते, लिहाजा फिल्म गति नहीं पकड़ पाती। फिल्म की कहानी एक अभिशप्त आईने से जुड़ी हुई है, जिसके चलते नताशा (हुमा कुरेशी) व कबीर मर्चेंट (साकिब सलीम) का परिवार बर्बाद हो जाता है। इसलिए नताशा उस आईने को नष्ट करना चाहती है। इस काम में वह अपने भाई कबीर मदद मांगती है, लेकिन चीजें उसके अनुसार नहीं घटतीं। एक तरह से देखा जाए...

हंसाते-हंसाते बखिया उधेड़ती है 'हिंदी मीडियम'

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राजीव रंजन ‘भारत में अंग्रेजी एक भाषा नहीं, क्लास है।’ और इस क्लास में पहुंचने के लिए हर क्लास, खासकर हिंदी मीडियम वाला मिडिल क्लास कुछ भी करने को तैयार रहता है। विडंबना है कि अंग्रेजी को गरियाने वाला क्लास दिन-रात इस क्लास में पहुंचने की जुगत में लगा रहता है। आप किसी भी भाषा में पारंगत है, लेकिन आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आपका ज्ञान व्यर्थ है। आप अपनी योग्यता और कड़ी मेहनत की बदौलत अच्छा-खासा कमाते-खाते हैं, लेकिन आपको अंग्रेजी नहीं आती तो सब बेकार। इरफान खान और सबा कमर स्टारर ‘हिंदी मीडियम’ इसी गंभीर मुद्दे को बड़े मनोरंजक अंदाज में पेश करती है। राज बत्रा (इरफान खान) की चांदनी चौक में गारमेंट की बड़ी दुकान है, जहां वह प्रसिद्ध ड्रेस डिजाइनरों के डिजाइन किए किए हुए परिधानों की कॉपी बेचता है। वह अपने काम और माहौल से खुश है, लेकिन उसकी पत्नी मीता (सबा कमर) अपनी बेटी पिया (दीशिता सहगल) के भविष्य को लेकर काफी आशंकित रहती है। उसे लगता है कि उसकी बेटी का दाखिला अगर दिल्ली के टॉप इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं हुआ तो वह अच्छी अंग्रेजी नहीं सीख पाएगी और अपने हमउम्र बच्चों से पिछड़ जाएगी। इससे उ...

विश्वास की जीत की कहानी

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राजीव रंजन ‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।’ अगर बहुत संक्षेप में ‘ट्यूबलाइट’ के बारे में बताना हो तो हिंदी गजल के सम्राट दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। इस फिल्म का मूल संदेश है- यकीन से पत्थर को भी हिलाया जा सकता है। इसी भाव के ईर्द-गिर्द पूरी फिल्म का ताना-बाना बुना गया है। यह युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी अमेरिकी फिल्म ‘लिटिल बॉय’ से प्रेरित है। बस अंतर ये है कि जहां ‘लिटिल बॉय’ पिता-पुत्र के प्यार की कहानी है, वहीं ‘ट्यूबलाइट’ में निर्देशक कबीर खान ने दो भाइयों के प्यार की कहानी को आधार बनाया है। कुमायूं क्षेत्र (वर्तमान में उत्तराखंड) के जगतपुर गांव में दो भाई हैं लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) और भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान)। उनके माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था। रामायण के विपरीत यहां लक्ष्मण बड़ा है और भरत छोटा। लक्ष्मण को सब ट्यूबलाइट कहते हैं, क्योंकि उसे कोई भी बात जल्दी समझ में नहीं आती। वह थोड़ा मंदबुद्धि है। लक्ष्मण उम्र में तो बड़ा है, लेकिन बड़े भाई का कर्तव्य छोटा भाई भरत उठाता है। जब दोनों बच्चे थे, तब...

मनोरंजन की ठीक-ठाक खुराक देते है बैंक चोर

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कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिनमें आप कुछ तलाशने की कोशिश न करें तो वो आपको मनोरंजन की ठीक-ठाक खुराक दे देती हैं। लेकिन जैसे ही आप उसमें तार्किकता, संदेश आदि ढूंढने की कोशिश करने लगते हैं, आपके हाथ से मनोरंजन भी फिसलने लगता है। यशराज की नई फिल्म ‘बैंक चोर’ भी एक ऐसी ही फिल्म है। इस फिल्म के बारे में एक बात और कही जा सकती है कि यह यशराज की ही ‘धूम’ सीरिज से बहुत प्रेरित है। हालांकि ‘धूम’ सीरिज का ट्रीटमेंट और फलक ‘बैंक चोर’ से बहुत बड़ा है। वैसे इतना तो कह ही सकते हैं कि यशराज ने अपना ही ईंट और रोड़ा उठा कर ‘बैंक चोर’ का कुनबा जोड़ा है। चंपक (रितेश देशमुख) एक बैंक चोर है, जो अपने दो साथियों गेंदा (विक्रम थापा) और गुलाब (भुवन अरोड़ा) के साथ मिल कर बैंक चोरी करने जाता है। वहां तीनों जिस तरह की हरकते करते हैं, उससे बैंक के अंदर बंधकों को लगता है कि तीनों पहली बार बैंक चोरी करने आए हैं। इस बैंक चोरी से निबटने का जिम्मा सीबीआई ऑफिसर अमजद खान (विवेक ओबेरॉय) को दिया जाता है। उसे लगता है कि यह कोई मामूली बैंक चोरी नहीं है, बल्कि इसमें कोई बड़ा खेल है। मौका-ए-वारदात पर मीडिया का भी जमावड़ा है, जो प...

दर्शकों से नहीं जुड़ पाया कोई 'राब्ता'

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राजीव रंजन पुनर्जन्म को लेकर भारतीय समाज में बड़ा कौतुहल रहता है। पुनर्जन्म के कितने किस्से हमें अनायास ही सुनने को मिल जाते हैं। शायद यही वजह है कि पुनर्जन्म हमेशा से बॉलीवुड को लुभाता रहा है। ज्यादा पीछे न जाएं तो भी हाल के कुछ वर्षों में इस विषय पर कुछ फिल्में बनी हैं, मसलन- शाहिद कपूर व प्रियंका चोपड़ा स्टारर ‘तेरी मेरी कहानी’ और सनी लियोने स्टार ‘एक पहेली लीला’। यह ऐसा विषय है, जिसे सही तरह से प्रस्तुत किया जाए तो दर्शकों से राब्ता जुड़ जाता है और अगर ठीक से न संभाला जाए तो रायता फैल जाता है। सुशांत सिंह राजपूत और कृति सैनन स्टारर ‘राब्ता’ के साथ कुछ ऐसा ही हुआ लगता है। यह प्रसिद्ध निर्माता दिनेश विजन की बतौर निर्देशक पहली फिल्म है, जो रिलीज से पहले कई कारणों से चर्चा में रही। कभी दीपिका पादुकोण के आइटम नंबर करने की खबर की वजह से तो कभी तेलुगू फिल्म ‘मगधीरा’ से प्लॉट चोरी के आरोपों की वजहों से। हालांकि ‘मगधीरा’ के निर्माता ने प्लॉट चोरी करने के केस को ‘राब्ता’ के रिलीज से ठीक पहले वापस ले लिया, जिससे फिल्म को बहुत राहत मिली। गौरतलब है कि ‘मगधीरा’ भी पुनर्जन्म की कहानी है, लेकिन उस...