मैम से मॉम का सफर और प्रतिशोध


राजीव रंजन

नया क्या है? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे हम बारहां रूबरू होते हैं। फिल्म ‘मॉम’ के मुताल्लिक ये सवाल किया जाए तो जवाब है- कुछ भी नया नहीं है। लेकिन... लेकिन... यहीं पर यह बात भी तो आती है... आप क्या कहते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरह कहते हैं। और इस कसौटी पर मॉम काफी हद तक खरी उतरती है। रुटीन कहानी होने के बावजूद यह फिल्म अपने प्रस्तुतीकरण की वजह से ज्यादातर समय बांधे रखती है।

फिल्म की शुरुआत स्कूल के दृश्य से होती है। देवकी (श्रीदेवी) बायोलॉजी की टीचर है। उसकी क्लास में उसकी सौतेली बेटी आर्या (सजल अली) भी है, जिसे उसका क्लासमेट मोहित भद्दे मैसेज करता है। देवकी उसका मोबाइल फेंक देती है। आर्या को देवकी अपनी बेटी मानती है, लेकिन देवकी को आर्या अपनी मां नहीं मानती। उसे मां की बजाय मैम कहती है। उसे लगता है कि उसके पिता आनंद सब्बरवाल (अदनान सिद्दीकी) उसकी मां को भूल गए हैं। उसे जाने-अनजाने लगता है कि ऐसा देवकी की वजह से हुआ है। लिहाजा वह देवकी की बेटी को तो स्वीकार कर लेती है, लेकिन देवकी को स्वीकार नहीं कर पाती। रिश्तों की इसी खींचतान के बीच एक दिन आर्या अपने दोस्तों के साथ वेलेंटाइन डे की पार्टी में शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक बड़े फार्महाउस में जाती है। वहां उसके साथ कुछ ऐसा गुजरता है कि उसकी जिंदगी बदल जाती है, उसके परिवार की जिंदगी बदल जाती है और फिल्म भी बदल जाती है। इस वाकये के बाद देवकी एक मिशन पर निकल पड़ती है, जहां उसे गलत और बहुत गलत में से एक को चुनना होता है। वह गलत को चुनती है। उसके मिशन में उसकी मदद एक प्राइवेट डिटेक्टिव दयाशंकर कपूर, ‘इन शॉर्ट डीके’ (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) करता है। इन लोगों से मोड़ मोड़ पर एक कड़क पुलिस ऑफिसर मैथ्यू फ्रांसिस (अक्षय खन्ना) भी टकराते रहता है।

यह एक इमोशनल थ्रिलर फिल्म है, जो काफी इंटेंस हैं। फिल्म के एक-दो दृश्यों शुरुआती को छोड़ दें तो पूरी फिल्म तनाव से भरी है। हां जब-जब नवाजुद्दीन पर्दे पर आते हैं, तनाव को थोड़ा कम करके हल्के-फुल्के क्षण भी दर्शकों देते हैं। फिल्म का पहला हाफ दूसरे हाफ की बनिस्बत ज्यादा कसा हुआ है और फिल्म के कथ्य को स्थापित करने में सफल रहता है। लेकिन दूसरा हाफ थोड़ा खींचा गया सा लगता है। कई बार यह फिल्म बोझिल भी होने लगती है। ढाई घंटे की इस फिल्म के 15-20 मिनट तो आसानी से कम किए जा सकते थे। फिल्म की पटकथा पर मेहनत की गई है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि देवकी को खासतौर पर बायोलॉजी के शिक्षक के रूप में दिखाया गया है। संवाद भी अच्छे हैं। ए.आर. रहमान का संगीत साधारण है कोई भी गाना याद रखने लायक नहीं है। एक गाना रहमान ने खुद गाया है। हां, बैकग्राउंड म्यूजिक अच्छा है और पूरी तरह फिल्म के अनुकूल है। फिल्म की सिनमेटोग्राफी काफी अच्छीू है। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है कि इसमें सब कुछ प्रत्याशित है। आगे की घटनाओं का अंदाजा आसानी से हो जाता है। और फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है इसकी बेहतरीन कास्टिंग। हर कलाकार अपनी भूमिका में पूरी तरह फिट है।

यह श्रीदेवी की 300वीं फिल्म है। और श्रीदेवी ने अपने तिहरे शतक को यादगार बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। अभिनय के स्तर पर वह इस फिल्म में एक अलग ही मुकाम पर खड़ी दिखाई देती हैं। सही मायने में वह इस फिल्म की जीवनरेखा हैं। हर दृश्य में उन्होंने जबरदस्त छाप छोड़ी है। खासकर अस्पताल वाले दृश्य में तो वह अद्भुत लगी हैं, जब उन्हें पता चलता है कि उनकी बेटी आर्या के साथ क्या हुआ है। उस समय उनका चीत्कार ऐसा लगता है, जैसे वहवाकई उस मानसिक आघात से गुजर रही हैं। उनके अभिनय में बस एक बात खटकती है। वह है उनका उच्चारण, जो एक ठेठ दिल्ली की महिला के हिंदी उच्चारण की बजाय दक्षिण भारतीय जैसा लगता है। इस पर काम किया जाना चाहिए था।
नवाजुद्दीन का अभिनय तो हर फिल्म में चौंका देता है। इतनी फिल्मों में काम करने के बावजूद उनके अभिनय में दोहराव नहीं दिखता। अगर अभिनय में नवाजुद्दीन को कोई मात दे सकता है तो वह है, सिर्फ नवाजुद्दीन। इस फिल्म में उनका गेटअप भी दिलचस्प है। अक्षय खन्ना बहुत समय के बाद दिखे हैं और बहुत अच्छे लगे हैं। पुलिस ऑफिसर के किरदार को उन्होंने बाखूबी निभाया है। इस फिल्म से दो पाकिस्तानी कलाकारों ने बॉलीवुड में आगाज किया है। सजल अली और अदनान सिद्दीकी ने। दोनों अपने देश में खासे लोकप्रिय हैं। सजल अली ने आर्या के किरदार को बहुत अच्छे-से पर्दे पर साकार किया है तो अदनान ने भी आर्या के पिता के रूप में बहुत संतुलित अभिनय किया है। पितोबश त्रिपाठी बहुत छोटी भूमिका में हैं, लेकिन ठीक हैं। जगन के रूप में अभिमन्यु सिंह का अभिनय भी अच्छा है।

मां ने ‘मदर इंडिया’ से लेकर ‘मॉम’ तक बॉलीवुड में एक लंबा सफर तय किया है। अब तक तक की उसकी यात्रा में सिनेमाप्रेमियों को उसके कई रंग देखने को मिले हैं। ‘मॉम’ भी मां का एक अलग और आधुनिक रंग है, जिसमें वह हालात से हारती नहीं है, बल्कि बदलने की कोशिश करती है। ‘मॉम’ को देख कर निराशा नहीं होगी।

ढाई स्टार

कलाकार- श्रीदेवी, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, सजल अली, अक्षय खन्ना, अदनान सिद्दीकी, अभिमन्यु सिंह
निर्देशक- रवि उदयावर
निर्माता- बोनी कपूर, सुनील मनचंदा, नरेश अग्रवाल, मुकेश तलरेजा, गौतम जैन
संगीतकार- ए. आर. रहमान
गीतकार- इरशाद कामिल, रियांजलि
पटकथा- गिरीश कोहली
सिनमेटोग्राफी- अनय गोस्वामी


साभार: हिन्दुस्तान

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