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फिल्म ‘गुलाबो सिताबो’ की समीक्षा

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एक अलग मिजाज की किस्सागोई राजीव रंजन कलाकार: अमिताभ बच्चन, आयुष्मान खुराना, विजय राज, बृजेंद्र काला, सृष्टि श्रीवास्तव, नलनीश नील, फारुख जफर निर्देशक: शुजीत सरकार स्टार- 3 आदमी अपनी जिंदगी में किसी चीज को हासिल करने के लिए क्या क्या जतन करता है, कितनी चालाकियां करता है, खूब तिकड़में भिड़ाता है, लेकिन अंत में हाथ लगती है, बस एक मुट्ठी धूल। एमेजॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज हुई अमिताभ बच्चन और आयुष्मान खुराना की ‘गुलाबो सिताबो’ का केंद्रीय भाव यही है। यह पहली फिल्म है, जो बनी तो थी, बड़े पर्दे के लिए, लेकिन पूरे विश्व में एक साथ रिलीज हुई छोटे पर्दे यानी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर। इस फिल्म ने बड़े कलाकारों वाली फिल्मों के ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज किए जाने की संभावनाओं का एक बड़ा द्वार खोल दिया है। भविष्य में कई फिल्मकार इस राह पर चल दें, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। फिल्म की शुरुआत होती है मिर्जा (अमिताभ बच्चन) के अपनी हवेली के किरायेदारों के बल्ब चुराकर बेचने और कठपुतली नृत्य ‘गुलाबो सिताबो’ से। ये दृश्य मिर्जा के किरदार की झलक पेश करते हैं और फिल्म के दूसरे मुख्य किरदार बांके रस्तोगी (आयुष...

करियर के पचासवें वर्ष में पचासवां दादा साहेब फाल्के सम्मान

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राजीव रंजन अमिताभ बच्चन जन्म- 11 अक्तूबर, 1942, इलाहाबाद (अब प्रयागराज), उत्तर प्रदेश पिता- हरिवंश राय बच्चन मां- तेजी बच्चन पत्नी- जया भादुड़ी बच्चन संतान- श्वेता बच्चन नंदा, अभिषेक बच्चन वर्ष 1969 भारतीय सिनेमा के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष था। उसी साल भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के’ का आगाज हुआ और भारतीय सिनेमा के सबसे बड़े नायक ने भी रूपहले पर्दे पर पदार्पण किया। लेकिन मंगलवार (24 सितंबर) के पहले तक यह एक संयोग ही था कि 50 सालों तक दोनों रेल की पटरियों की तरह साथ-साथ चलते रहे, लेकिन उनका मेल नहीं हो पाया था। अमिताभ के प्रशंसकों के लिए यह दुखदायी स्थिति थी। अमिताभ बच्चन को सिनेमा का हर पुरस्कार और सम्मान मिल चुका था, लेकिन सिनेमा का यह सबसे बड़ा शख्स सिनेमा के शिखर सम्मान से वंचित था। सहस्राब्दि के स्टार अमिताभ बच्चन के प्रशंसक बहुत पहले से कहते आ रहे थे कि उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहेब फाल्के’ देने में देरी की जा रही है। लेकिन शायद कुछ लोगों के लिए नियति विशेष अवसर चुन कर रखती है। अमिताभ भी इन्हीं लोगों में शामिल हैं। इस साल जब अ...

गुदड़ी के लाल कादर खान

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राजीव रंजन करीब  300  से ज्यादा फिल्मों में अभिनय करने और  250  से ज्यादा फिल्मों में संवाद लिखने वाले कादर खान की जिंदगी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।  ‘ फर्श से अर्श ’   पर पहुंचने की उनकी कहानी में इतने उतार - चढ़ाव है कि उस पर एक प्रेरक और रोचक फिल्म बन जाए। एक समय ऐसा भी था कि उनका रुतबा फिल्म के हीरो से ज्यादा हुआ करता था। निर्माता - निर्देशक उन्हें अपनी फिल्मों में लेने और संवाद लिखवाने के लिए इंतजार करते थे। उन्होंने अपने संवादों से  80  और  90  के दशक में फिल्मों की भाषा ही बदल दी। उनकी भाषा वैसी ही भाषा थी ,  जो आम आदमी बोलता है ,  समझता है ,  लेकिन उसमें कई बार दार्शनिकों वाली गहराई होती थी। हालांकि कई बार द्विअर्थी संवाद लिखने के कारण उनकी आलोचना भी हुई। बतौर अभिनेता आखिरी बार वह फिल्म  ‘ हो गया दिमाग का दही ’   में नजर आए थे। इसमें उनकी काफी छोटी भूमिका थी और उन्हें देख कर लगता था कि उनकी शारीरिक अवस्था ठीक नहीं है। कादर खान का जन्म अफगानिस्तान के काबुल में हुआ था। उनके पिता अब्दुल रहमान खा...