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एक फ्रेंड रिक्वेस्ट जो एक्सेप्ट ना हो सकी

राजीव रंजन
करीब करीब मेरे सभी करीबी दोस्त फेसबुक पर हैं। शशांक भी फेसबुक पर आ गया था, लेकिन मेरी आभासी मित्रता सूची में नहीं था। एक दिन मैंने उसकी आईडी सर्च की और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। कुछ महीने पहले की बात थी। बार-बार देखता था कि उसने एक्सेप्ट की या नहीं। जब भी देखता तो जवाब ‘नहीं’ में मिलता। उसकी इस बेजारी पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। साला जब अपने अकाउंट में झांकने की फुरसत या इच्छा ही नहीं थी, तो आईडी बनाई ही क्यों थी! लेकिन मुझे क्या पता था कि उसे तो काल ने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज रखी थी, मेरी रिक्वेस्ट स्वीकार करता भी कैसे। नालायक भयानक एक्सीडेंट का शिकार होकर आईसीयू में भर्ती था। पिछले तीन महीने से जिंदगी और मौत के बीच में झूल रहा था। कभी उम्मीद बंधती थी, कभी टूटती थी। और फिर सारे बंंधन तोड़ कर उसने मेरी रिक्वेस्ट की बजाय काल की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। दिन भी कौन-सा चुना, मेरे जन्मदिन वाला। 17 जुलाई। आज सबसे छोटी बहन छोटकी बुची (आरती) से पता चला।

एक आदत उसकी कभी नहीं सुधरी। जब भी हम किसी काम से जाते थे और रास्ते में उसे कोई परिचित मिल जाता था, तो उस तीसरे के कहने पर वह उसी के…

ये मुन्ना माइकल है और थोड़ा रैम्बो भी

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राजीव रंजन, नई दिल्ली
स्टार- ढाई स्टार
कलाकार: टाइगर श्रॉफ, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, निधि अग्रवाल, रोनित रॉय
निर्देशक : शब्बीर खान

माइकल जैक्सन ने अपने डांस से पूरी दुनिया में अनगिनत युवाओं को प्रेरित किया है। एमजे से प्रेरित होकर कई युवाओं ने डांस को अपना करियर बनाया। भारत में भी एमजे के दीवानों की कमी नहीं। अपने समय में बॉलीवुड के सबसे बड़े डांसिंग स्टार रहे मिथुन चक्रवती भी उनसे बहुत प्रभावित रहे हैं और उनके स्टेप्स करने की प्रैक्टिस भी किया करते थे। टाइगर श्रॉफ की ‘मुन्ना माइकल’ की प्रेरणा भी एमजे ही हैं। बस इसमें थोड़ा ‘रैम्बो’ को भी मिला दिया गया है।

माइकल (रोनित रॉय) एक डांसर है, जो फिल्मों में ग्रूप डांस करता है। वह माइकल जैक्सन का बहुत बड़ा फैन है। एक दिन उसे काम से निकाल दिया जाता है, क्योंकि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। उसी रात उसे एक लावारिस शिशु रास्ते में पड़ा मिलता है। माइकल बच्चे का नाम मुन्ना रखता है और उसे घर ले आता है। मुन्ना डांस से दीवानगी की हद तक प्यार करता है। वह अपने दोस्तों के साथ क्लब वगैरह में डांस की शर्त जीत कर पैसे कमाता है। मुन्ना के बाबा को एक गंभीर बीमारी हो…

बहुत प्यारा सा है ये जग्गा जासूस

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राजीव रंजन
3 स्‍टार
कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी
निर्देशक: अनुराग बसु
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती


एक कहावत है ‘देर आए दुरुस्त आए'। अनुराग बसु निर्देशित फिल्म ‘जग्गा जासूस’ पर ये कहावत सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद ठीक बैठती है। अनुराग की ये रणबीर कपूर-कैटरीना कैफ स्टारर फिल्म काफी समय से लटकी हुई थी, कई बार इसकी रिलीज की तारीखें बदली। एक समय तो ऐसा भी लगने लगा था कि यह फिल्म थियेटरों का मुंह देख भी पाएगी कि नहीं।
बहरहाल, यह साफ कर देना ठीक रहेगा कि भले ही इसके नाम में जासूस शब्द जुड़ा है, लेकिन यह पारम्परिक जासूसी फिल्मों जैसी नहीं है। ऐसा लगता है, अनुराग ने इस फिल्म को बच्चों को ध्यान में ज्यादा रख कर बानाया है। फिल्म की शुरुआत दिसंबर, 1995 के बहुचर्चित पुरुलिया हथियार कांड के संदर्भ से शुरू होती है और फिल्म का मूल विषय हथियारों की तस्करी से जुड़ा है लेकिन इसका प्रस्तुतीकरण एक आम जासूसी थ्रिलर जैसा नहीं है।

जग्गा (रणबीर कपूर) जन्म से अनाथ है और उसका लालन-पालन अस्पताल में होता है। उसी अस्पताल में एक दिन बादल बागची उर्फ टूटी फूटी (शाश्वत चटर्जी) भी भर्ती होता है। जग्गा…

मैम से मॉम का सफर और प्रतिशोध

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राजीव रंजन

नया क्या है? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे हम बारहां रूबरू होते हैं। फिल्म ‘मॉम’ के मुताल्लिक ये सवाल किया जाए तो जवाब है- कुछ भी नया नहीं है। लेकिन... लेकिन... यहीं पर यह बात भी तो आती है... आप क्या कहते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरह कहते हैं। और इस कसौटी पर मॉम काफी हद तक खरी उतरती है। रुटीन कहानी होने के बावजूद यह फिल्म अपने प्रस्तुतीकरण की वजह से ज्यादातर समय बांधे रखती है।

फिल्म की शुरुआत स्कूल के दृश्य से होती है। देवकी (श्रीदेवी) बायोलॉजी की टीचर है। उसकी क्लास में उसकी सौतेली बेटी आर्या (सजल अली) भी है, जिसे उसका क्लासमेट मोहित भद्दे मैसेज करता है। देवकी उसका मोबाइल फेंक देती है। आर्या को देवकी अपनी बेटी मानती है, लेकिन देवकी को आर्या अपनी मां नहीं मानती। उसे मां की बजाय मैम कहती है। उसे लगता है कि उसके पिता आनंद सब्बरवाल (अदनान सिद्दीकी) उसकी मां को भूल गए हैं। उसे जाने-अनजाने लगता है कि ऐसा देवकी की वजह से हुआ है। लिहाजा वह देवकी की बेटी को तो स्वीकार कर लेती है, लेकिन देवकी को स्वीकार नहीं कर पाती। रिश्तों की इसी खींचतान के बीच एक दिन आर्या अपने दोस्…

मंटो की कहानियों जैसी तासीर नहीं पैदा कर पाती 'मंटोस्तान'

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राजीव रंजन
बंटवारे की स्याह हकीकत को अगर किसी ने सबसे ज्यादा प्रामाणिकता के साथ अपनी कहानियों में बयां किया है तो वह हैं सआदत हसन मंटो। उनकी कहानियों में बंटवारे के समय के हालात, लोगों की बेचारगी, लोगों की दरिंदगी इस नंगे और तल्ख रूप में सामने आती है कि रूह बेचैन हो जाती है। उनकी कहानियां एक बार पढ़ने के बाद हमेशा के लिए जेहन में बस जाती है। मंटो की कहानियों की तासीर ही ऐसी है कि वे पढ़ने वाले को झकझोर कर रख देती है।

कभी-कभी तो लगता है कि उनके लेखन में इतनी तल्खी क्यों भरी है। इस सवाल का मंटो इन शब्दों में जवाब देते हैं- ‘जमाने के जिस दौर से हम इस वक्त गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां है, वो इस अहद (समय) की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर (रचना) में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स (त्रुटि) को मेरे नाम से मंसूब (संबंधित) किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम (व्यवस्था) का नुक्स है- मैं हंगामा पसंद नहीं। मैं लोगों के खयालातों-जज्बात में हैजान (अशांति) पैदा करना नहीं चाहत…

भय का माहौल रचने में नाकाम 'दोबारा'

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राजीव रंजन

आप किसी फिल्म के बारे में यह सोच कर जाते हैं कि वह एक हॉरर फिल्म है, और पूरे समय यह इंतजार करते रह जाते हैं कि बदन में झुरझुरी अब होगी, अब होगी। अब रोंगटे खड़े होंगे, लेकिन अंत तक ऐसा होता नहीं और आखिर आप ठगा हुआ-सा महसूस करते हुए सिनेमाहॉल से बाहर आ जाते हैं। 'दोबारा: सी योर ईविल' दर्शकों के साथ ऐसा ही बर्ताव करती है। बस एकाध सीन अपवाद के रूप में मान सकते हैं।

'दोबारा' 2014 में आई हॉलीवुड फिल्म 'ऑक्यूलस' का हिंदी रीमेक है और इसके निर्देशक माइक फ्लैनेगन 'दोबारा' से कार्यकारी निर्माता के रूप में जुड़े हुए हैं। फिल्म का पूर्वाद्र्ध बहुत धीमा है। उत्तराद्र्ध कुछ उम्मीद जगाता है, लेकिन निर्देशक घटनाओं को असरकारक तरीके से पेश नहीं कर पाते, लिहाजा फिल्म गति नहीं पकड़ पाती।

फिल्म की कहानी एक अभिशप्त आईने से जुड़ी हुई है, जिसके चलते नताशा (हुमा कुरेशी) व कबीर मर्चेंट (साकिब सलीम) का परिवार बर्बाद हो जाता है। इसलिए नताशा उस आईने को नष्ट करना चाहती है। इस काम में वह अपने भाई कबीर मदद मांगती है, लेकिन चीजें उसके अनुसार नहीं घटतीं।

एक तरह से देखा जाए तो इस म…

हंसाते-हंसाते बखिया उधेड़ती है 'हिंदी मीडियम'

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राजीव रंजन
‘भारत में अंग्रेजी एक भाषा नहीं, क्लास है।’ और इस क्लास में पहुंचने के लिए हर क्लास, खासकर हिंदी मीडियम वाला मिडिल क्लास कुछ भी करने को तैयार रहता है। विडंबना है कि अंग्रेजी को गरियाने वाला क्लास दिन-रात इस क्लास में पहुंचने की जुगत में लगा रहता है। आप किसी भी भाषा में पारंगत है, लेकिन आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आपका ज्ञान व्यर्थ है। आप अपनी योग्यता और कड़ी मेहनत की बदौलत अच्छा-खासा कमाते-खाते हैं, लेकिन आपको अंग्रेजी नहीं आती तो सब बेकार। इरफान खान और सबा कमर स्टारर ‘हिंदी मीडियम’ इसी गंभीर मुद्दे को बड़े मनोरंजक अंदाज में पेश करती है।

राज बत्रा (इरफान खान) की चांदनी चौक में गारमेंट की बड़ी दुकान है, जहां वह प्रसिद्ध ड्रेस डिजाइनरों के डिजाइन किए किए हुए परिधानों की कॉपी बेचता है। वह अपने काम और माहौल से खुश है, लेकिन उसकी पत्नी मीता (सबा कमर) अपनी बेटी पिया (दीशिता सहगल) के भविष्य को लेकर काफी आशंकित रहती है। उसे लगता है कि उसकी बेटी का दाखिला अगर दिल्ली के टॉप इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं हुआ तो वह अच्छी अंग्रेजी नहीं सीख पाएगी और अपने हमउम्र बच्चों से पिछड़ जाएगी। इससे उसके…