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निराश नहीं करती है सुलु

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राजीव रंजन

कलाकार: विद्या बालन, मानव कौल, नेहा धूपिया, विजय मौर्य, अभिषेक शर्मा
निर्देशक व लेखक: सुरेश त्रिवेणी
ढाई स्टार (2.5 स्टार)


एक अच्छी फिल्म वह होती है, जो अपने विषय, प्रस्तुतीकरण, सिनेमाई प्रभाव और कलाकारों के अभिनय की बदौलत शुरू से लेकर आखिर तक पटरी पर रहती है। एक सामान्य फिल्म वह होती है, जो काफी देर तक पटरी पर रहती है, लेकिन फिर पटरी से उतर जाती है। हालांकि वह दुबारा पटरी पर आती है, लेकिन तब तक अपना वह प्रभाव खो चुकी होती है, जो उसने शुरुआती क्षणों में पैदा किया था। विद्या बालन की ‘तुम्हारी सुलु’ दूसरी वाली श्रेणी में आती है। फिल्म के पहले हाफ में इसने जो ऊंचाई हासिल की थी, दूसरे हाफ में उसको बरकरार नहीं रख पाती और वहां से फिसल जाती है।

यह कहानी है सुलोचना उर्फ सुलु (विद्या बालन) की, जो मुंबई के उपनगर विरार में रहती है। उसका एक छोटा-सा परिवार है, जिसमें पति अशोक (मानव कौल) और बेटा प्रणव (अभिषेक शर्मा) हैं। सुलु भी एक सामान्य गृहिणी है और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों को पूरा करने में जुटी रहती है, लेकिन उसके साथ ही उसमें ‘कुछ करने’ की तमन्ना भी जोर मारती रहती है। उसके मन में…

रुख: सबके लिए नहीं है यह कहानी

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राजीव रंजन

फिल्म: रुख
ढाई स्टार (2.5 स्टार)
निर्देशक: अतनु मुखर्जी
निर्माता: मनीष मुंद्रा
कलाकार: मनोज बाजपेयी, आदर्श गौरव, स्मिता तांबे, कुमुद मिश्रा
संगीत: अमित त्रिवेदी


एक बात पहले ही साफ कर देनी जरूरी है कि ‘रुख’ वीकेंड पर एन्जॉय करने वाला सिनेमा नहीं है। जिस तरीके से इसे बनाया गया है, उससे जान पड़ता है कि इसे मास के लिए ध्यान में रख कर नहीं बनाया गया है। हालांकि फिल्म की जो कहानी है, उसमें तेज गति वाली एक सस्पेंस थ्रिलर की तमाम संभावनाएं मौजूद थीं, साथ ही भावनापूर्ण दृश्यों की भी काफी संभावना थी, लेकिन लेखक-निर्देशक अतनु मुखर्जी ने इस कहानी को अपने तरीके से कहने की कोशिश की है। यह फिल्म दिखाती है कि अपने परिवार के भविष्य की चिंता में कोई व्यक्ति कहां तक जा सकता है!

दिवाकर माथुर (मनोज बाजपेयी) मुंबई में एक चमड़े का कारखाना चलाता है। उसकी फैक्ट्री संकट में है। वह अपने पार्टनर रोबिन (कुमुद मिश्रा) से पैसों का इंतजाम करने के लिए कहता है, लेकिन रोबिन उसे उधार लेकर काम चलाने को कहता है और कुछ समय बाद पैसों का बंदोबस्त करने का आश्वासन देता है। दिवाकर कहीं से उधार लेकर फैक्ट्री के कर्मचारिय…

जय हो छठी मैया। जय हो सुरुज देव।

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राजीव रंजन

जय हो छठी मैया। जय हो सुरुज देव।
दुनिया भर के सभी त्योहार लोक पर्व होते हैं, क्योंकि बिना लोक के धर्म की रक्षा नहीं हो सकती और बिना धर्म के लोक भी रक्षित नहीं हो सकता। हमारे यहां कहा भी गया है- ‘धर्मो रक्षति रक्षित:।’ तो हर पर्व में शास्त्र के अनुशासन के साथ लोक तत्त्व भी सहज स्वाभाविक रूप से घुला होता है। लोक को धर्म से और धर्म को लोक से अलग नहीं किया जा सकता। शास्त्र सम्मत पर्वों में भी हर युग अपनी अनुकूलताओं का तत्त्व जोड़ कर पर्व को युगानुकूल और युग को धर्मानुकूल बना लेता है।

छठ भी इसका अपवाद नहीं। लेकिन इसे हम पुरबिया लोग ‘लोक आस्था का महापर्व’ कहते और मानते हैं। इसे हमारी भावनात्मक तरलता कहा जा सकता है। लेकिन यह सिर्फ पुरबिया लोक की भावुकता नहीं है। वास्तव में इस लोक महापर्व में शास्त्र के अनुशासन के साथ लोक की भावना का जो दिव्य प्रस्फुटन देखने को मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है। जब असंख्य व्रती अपने परिवार के साथ दौरा लेकर छठ घाट की ओर प्रस्थान करते हैं और एक साथ पहले अस्ताचलगामी भगवान सूर्य और फिर उदित होते सूर्य देव को एक साथ अघ्र्य देते हैं तो ऋग्वेद का यह मंत्र अपन…

बा के बिना अधूरे थे बापू

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राजीव रंजन

‘बा के बिना जीने की आदत डालूंगा...।’ दोनों भाइयों की हिचकी बंध गई। बापू ने हाथ से जाने का इशारा किया।’
(गिरिराज किशोर के उपन्यास ‘बा’ से उद्धृत)

‘बापू’ में ‘बा’ समाहित है, यह सत्य है और यह भी उतना ही सत्य है कि ‘बा’ के बगैर ‘बापू’ भी अधूरे हैं। दोनों के 62 सालों के दाम्पत्य पर नजर डालें तो यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि ‘बापू’ में अगर ‘बा’ नहीं होतीं तो शायद वह मोहनदास से महात्मा का सफर नहीं तय कर पाते। 13 वर्ष की कच्ची आयु से शुरू हुआ दोनों का संग साथ 1944 में बा की मृत्यु के साथ समाप्त हुआ। यह एक ऐसा दाम्पत्य जीवन था, जो जीवन में आए तमाम झंझावातों के बीच टिका रहा। मात्र टिका नहीं रहा, बल्कि हर कठिनाई के बाद और अटूट बनता गया।

यह दाम्पत्य पत्नी का अपने पति के लक्ष्यों में खुद को समाहित कर लेने की प्रेरक गाथा है तो और अपनी पति द्वारा अपनी पत्नी को वास्तविक अर्थों में सहचर मानने की दास्तान है। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। निजी और सार्वजनिक जीवन दोनों में। दोनों का दाम्पत्य जीवन आज की पीढ़ी के लिए भी उतना प्रेरक और प्रासंगिक है, जितना आज से एक शताब्दी पहले था। बा ने बापू के लिए ख…

लखनऊ सेंट्रल: कलाकार अच्छे, कहानी कमजोर

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राजीव रंजन

कलाकार: फरहान अख्तर, डायना पेंटी, रवि किशन, दीपक डोबरियाल, रोनित रॉय, राजेश शर्मा, जिप्पी ग्रेवाल, इनामुल हक, वीरेंद्र सक्सेना
रेटिंग- 2.5 स्टार


छोटे शहर के लोगों के बड़े सपने और उन सपनों के बीच आने वाली बाधाएं, उन बाधाओं पर जीत और अंतत: सपनों का साकार होना। इस थीम पर बॉलीवुड में कई फिल्में बनी हैं और उनमें से कुछ ने असर भी छोड़ा है। इसी कड़ी में बॉलीवुड की नई पेशकश है ‘लखनऊ सेंट्रल’। फिल्म के सह-लेखक व निर्देशक रंजीत तिवारी और लेखक असीम अरोड़ा ने एक ऐसी कहानी बुनने की कोशिश की है, जिसमें संजीदगी, मनोरंजन और रोमांच, सब पर्याप्त मात्रा में हो। उन्होंने इसे ‘मास’ और ‘क्लास’ दोनों के लिए बनाने की कोशिश की है, लेकिन चूक गए हैं। यह एक शुद्ध मसाला बॉलीवुड फिल्म बन कर रह गई है, जिसमें मसालों का चयन और अनुपात भी ठीक नहीं है।

किशन मोहन गिरहोत्रा (फरहान अख्तर) उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का एक आम नौजवान है। वह गायक बनना चाहता है। अपना बैंड बनाना उसका सबसे बड़ा सपना है। वह अपनी सीडी रिकॉर्ड करता है और प्रसिद्ध गायक-अभिनेता मनोज तिवारी को सुनना चाहता है, जो उसके शहर में कंसर्ट के लिए आए हैं। इ…

सेठ गोविंद दास: हिंदी को राजभाषा का दर्जा देने के बड़े पैरोकार

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राजीव रंजन

भारत में हिन्दी के उत्थान के लिए जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनमें सेठ गोविन्द दास का नाम अनन्य है। उन्होंने स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी हिन्दी के उत्थान के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। यहां तक कि हिन्दी के सवाल पर वह अपनी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस की नीति से अलग जाकर संसद में हिंदी का जोरदार समर्थन किया। वह भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी के जबरदस्त समर्थक थे। ‘महाकौशल केसरी’ गोविंद दास साहित्यकार के साथ-साथ सफल राजनेता भी थे। वह 1923 में केंद्रीय सभा के लिए चुने गए। साथ ही 1947 से 1974 तक, जब तक जीवित रहे, कांग्रेस के टिकट पर जबलपुर के सांसद भी रहे। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें 1961 में भारत के तीसरे बड़े नागरिक सम्मान ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया था।

सेठ गोविन्द दास का जन्म जबलपुर के बहुत समृद्ध माहेश्वरी परिवार में सेठ जीवनदास के पुत्र के रूप में 16 अक्टूबर, 1896 को हुआ था। इनके दादा सेठ गोकुल दास ने अपने पारिवारिक कारोबार को बहुत ऊंचाई पर पहुंचाया, इसीलिए उन्हें राजा गोकुल दास भी कहा जाता था। गोविन्द दास की प्रारम्भिक श…

खोपड़ी से काम मत लो! फूट जाएगी

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‘पोस्टर बॉयज’ की समीक्षा

राजीव रंजन

2.5 स्टार

कलाकार: सन्नी देओल, बॉबी देओल, श्रेयस तलपड़े, सोनाली कुलकर्णी, समीक्षा भटनागर, अश्विनी कलसेकर, भारती अचरेकर
निर्देशक: श्रेयस तलपड़े


पिछले शुक्रवार ‘मर्दानगी’ से जुड़ी भ्रांतियों पर एक फिल्म आई थी ‘शुभ मंगल सावधान’। इस हफ्ते भी ऐसे ही विषय से जुड़ी एक और फिल्म आई है ‘पोस्टर बॉयज’, जो नसबंदी के बारे में बात करती है। लेकिन गंभीरता से नहीं, चलताऊ हंसी-मजाक के साथ। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे समाज में नसबंदी कराने वालों को ‘अच्छी नजर’ से नहीं देखा जाता। नसबंदी को ‘मर्दानगी बंदी’ के रूप में देखा जाता है। इस फिल्म का ताना-बाना इसी कथ्य के इर्द-गिर्द बुना गया है।

एक गांव है जंगीठी, जो भाषा, भाव, माहौल के लिहाज से हरियाणा का कोई गांव लगता है। यहां रहते हैं रिटायर्ड फौजी जगावर सिंह (सन्नी देओल), स्कूल मास्टर विनय शर्मा (बॉबी देओल) और रिकवरी एजेंट अर्जुन सिंह (श्रेयस तलपड़े)। जगावर सेल्फी लेने के शौकीन है, मास्टर को कोई चीज बताते हुए बीच में ही भूल जाने की आदत है। अर्जुन को टशन झाड़ने की आदत है और वह रॉक स्टार के अंदाज़ में रहता है। उसके दो चेले हैं, जिनके …

‘अलीबाबा’ और ‘गुफा’ की रोचक दास्तान

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राजीव रंजन

शुभ मंगल सावधान
3 स्टार
कलाकार: आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, सीमा पाहवा, बृजेंद्र काला, सुप्रिया शुक्ला, अंशुल चौहान
निर्देशक: आर.एस. प्रसन्ना


हाल-फिलहाल कुछ ऐसी फिल्में आईं हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि शुष्क और नीरस हुए बगैर भी गंभीर मसलों पर बात की जा सकती है। एकदम मनोरंजक अंदाज में। ‘हिंदी मीडियम’, ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ इसका हालिया उदाहरण हैं। ‘शुभ मंगल सावधान’ भी ऐसी ही फिल्म है। यह ‘मर्दाना कमजोरी’ जैसे विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में उठाती है, जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता।

मुदित शर्मा (आयुष्मान खुराना) गुड़गांव में रहता है। सुगंधा (भूमि पेडणेकर) दिल्ली के मोती बाग में रहती है। दोनों की राहें नेहरू प्लेस में टकराती हैं। मुदित को सुगंधा अच्छी लगती है। सुगंधा को भी मुदित अच्छा लगता है। लेकिन समस्या यह है कि मुदित यह बात बता नहीं पाता और सुगंधा चाहती है कि मुदित पहल करे। एक दिन वह दोस्तों के कहने पर हिम्मत जुटाता है और सुगंधा से अपनी भावनाओं का इजहार करने जाता ही है कि बीच में उसे भालू पकड़ लेता है। आखिरकार मुदित अपनी मां…

राजीव, राव और कांग्रेस क्यों नहीं जिम्मेदार हैं बाबरी विध्वंस के लिए?

राजीव रंजन

इसे करीब आठ साल पहले लिखा था। आज पुरानी फाइलों को खंगालते हुए इस पर नजर पड़ गई तो सोचा क्‍यों न इसे ब्लॉग पर डाल दूं।

साल और 48 अवधि विस्तार के बाद जस्टिस एम. एस. लिब्रहान ने आखिरकार विवादित ढांचे (राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद) विध्वंस के बारे में अपनी रिपोर्ट दे दी है। जैसीकि उम्मीद थी, इसे लेकर काफी बवाल मचा और अभी भी मच रहा है। इसे लेकर कई तरह के सवाल उठाए जा रहे हैं, जो वाजिब भी हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि विवादित ढांचे (राम जन्मभूमि- बाबरी मस्जिद) के विध्वंस के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पामुलपति वेंकट नरसिंह राव क्यों नहीं दोषी हैं? क्या इस पूरे प्रकरण में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कोई भूमिका नहीं है?

6 दिसंबर, 1992 को जब विवादित ढांचे को जमींदोज कर दिया गया, तब देश के प्रधानमंत्री नरसिंह राव ही थे। उनके हाथ में सारी शक्तियां थीं, राज्य सरकार को बर्खास्त करने की भी। नरसिंह राव सरकार में मंत्री रहे माखनलाल फोतेदार ने निजी समाचार चैनल ‘एनडीटीवी’ के प्रोग्राम ‘हमलोग’ में साफतौर पर नरसिंह राव को जिम्मेदार ठहराया निष्क्रियता के लिए। उन्होंने कहा कि राव ने उत्तर प्रदेश …

दूर तक सूंघने वाला बच्चा जासूस

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राजीव रंजन

2 स्‍टार (दो स्‍टार)
कलाकार: खुशमीत गिल, सुरेखा सीकरी, सुष्मिता मुखर्जी, राजेश पुरी, अमोल गुप्ते
लेखक व निर्देशक: अमोल गुप्ते


लेखक, अभिनेता और निर्माता-निर्देशक अमोल गुप्ते को बच्चों से विशेष प्यार है। अब तक उन्होंने बच्चों को केंद्र में रख कर ही अपनी फिल्मों का ताना-बाना बुना है। चाहे बतौर लेखक 'तारे जमीन' पर हो या बतौर लेखक-निर्देशक 'स्टेनली का डब्बा' और 'हवा हवाई', इन सभी फिल्मों के केंद्र में बच्चे हैं। ' ' का कथानक भी बच्चों के ईर्द-गिर्द ही बुना गया है।

मुम्बई की एक सोसाइटी में रहने वाले बच्चे सन्नी गिल (खुशमीत गिल) के परिवार का अचार का बिजनेस है और इस व्यवसाय के लिए अच्छी घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) जरूरी है, लेकिन सन्नी सूंघ नहीं सकता। सन्नी की दादी (सुरेखा सीकरी) इससे बहुत चिंतित हैं। वह सन्नी का इलाज कराने के लिए हर जुगत भिड़ाती है, पर कामयाबी नहीं मिलती। एक बड़ा डॉक्टर बताता है कि सन्नी के नाक की एक नस बंद है, लिहाजा वह कभी सूंघ नहीं सकता। सन्नी की इस कमी का उसके क्लासमेट मजाक उड़ाते हैं। एक दिन सन्नी घूमते-घूमते अपने स्कूल की बंद पड़…

नवाज के कंधों पर राजनीति, गालियों और गोलियों की बंदूक

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राजीव रंजन

2.5 स्टार (ढाई स्टार)
निर्देशक : कुषाण नंदी
कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विदिता बाग, जतिन गोस्वामी


इन दिनों जब किसी फिल्म से नवाजुद्दीन सिद्दीकी का नाम जुड़ा होता है तो दर्शकों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। लेकिन उम्मीदें हर बार पूरी हों ही, यह जरूरी नहीं। चाहे कितना भी बड़ा भी कलाकार क्यों न हो, अकेले वह कमाल नहीं कर सकता। इसके ढेर सारे उदाहरण हैं। कुशान नंदी निर्देशित और नवाजुद्दीन स्टारर के साथ कुछ ऐसी ही है। इस फिल्म में कुषाण ने नवाज के कंधे पर बंदूक रख कर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का नया संस्करण रचने की कोशिश की है। उन्होंने गालियां भी खूब इस्तेमाल की हैं, हिंसा भी खूब करवाई है और सेक्स का तड़का भी लगाया है, लेकिन वह असर पैदा नहीं कर पाए हैं, जो ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में था।

दरअसल फिल्म की पटकथा ढीली हो, प्रस्तुतीकरण में ताजगी न हो तो सारे मसाले होते हुए भी जायका जुबान पर नहीं चढ़ पाता। इस फिल्म में मसाले तो सारे हैं, लेकिन उनका कितना और कैसा इस्तेमाल किया जाए, इसे तय करने में निर्देशक कुषाण नंदी चूक गए। यही वजह है कि ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ एक बेहतर फिल्म होने की संभावना लिए होते हुए भी…

रोमांस और कॉमेडी में पगी बरेली की बर्फी

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राजीव रंजन

तीन स्टार

पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड ने महानगरों के अलावा छोटे शहरों की कहानियों को भी प्रमुखता देनी शुरू कर दी है। दरअसल छोटे शहर की कहानियां और उनके किरदार एकरसता को तोड़ते हैं और दर्शकों को एक नए रस-रंग से रूबरू कराते हैं, अगर उन्हें ठीक तरीके से पेश किया जाता है तो। ‘बरेली की बर्फी’ भी एक ऐसी ही फिल्म है, जो उत्तर प्रदेश के छोटे शहर की पृष्ठभूमि में कही गई है। फिल्म के नाम से जाहिर ही है कि वह शहर बरेली है, जहां सालों पहले गिरे झुमके को दर्शक अब भी नहीं भूल पाए हैं। बॉलीवुड में बरेली ‘झुमके’ के लिए मशहूर है तो उत्तर भारत में यहां के बने बांस के फर्नीचर काफी मशहूर हैं। इसे बांस-बरेली भी कहते हैं। लेकिन बरेली का बर्फी से ऐसा क्या रिश्ता है, जिसके कारण बरेली को बर्फी से जोड़ कर फिल्म बनाई जाए! इसे जानने के लिए आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा।

‘बरेली की बर्फी’ की कहानी बरेली की एक लड़की बिट्टी मिश्रा (कृति सैनन) की कहानी है, जो वर्जनाओं को नहीं मानती। वह सिगरेट पीती है, बिजली विभाग में नौकरी करती है, ब्रेक डांस करती है और जिन्दगी को खुल कर जीना चाहती है। अपनी सीमाओं में वह बिंदास …

उसकी याद आती रही

राजीव रंजन
याद नहीं करता उसे
फिर भी याद आ जाता है
मैं तो समझा था
किताब में लिखा सबक है बस
याद करने पे ही याद आएगा
वो तो ज़िन्दगी की किताब निकला।

जब हैरी मेट सेजल: नई बोतल में प्रेम कहानी की पुरानी शराब

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2 स्टार
कलाकार: शाहरुख़ खान, अनुष्का शर्मा
लेखक व निर्देशक: इम्तियाज़ अली
सिनेमेटोग्राफी: के. यू. मोहनन
निर्माता: गौरी खान


'जब हैरी मेट सेजल' फिल्म के नाम और इम्तियाज अली, फिल्म के निर्देशक के नाम से यह तय-सा था कि यह भी एक प्रेम कहानी होगी। यहां तक तो कोई समस्या नहीं है। उम्मीद थी कि इम्तियाज यह प्रेम कहानी एक अलग अंदाज में परोसेंगे, जिसके लिए वह जाने जाते हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। यह फिल्म इम्तियाज की बहुत कम (बल्कि न के बराबर) और यशराज व धर्मा के स्टाइल की ज्यादा लगती है।

फिल्म की कहानी एम्स्टर्डम से शुरू होती है। हैरी (शाहरुख खान) एक टूर गाइड है। वह गुजरात के एक हीरा व्यापारी के परिवार को यूरोप के विभिन्न देशों में घुमाता है। सेजल (अनुष्का शर्मा) उसी हीरा व्यापारी की बेटी है, जिसकी सगाई इसी टूर के दौरान एम्सटर्डम में होती है। उसकी सगाई की अंगूठी कहीं खो जाती है, जिसके चलते मंगेतर से उसका झगड़ा हो जाता है। वह अंगूठी ढूंढने के लिए रुक जाती है और हैरी को अपने साथ चलने के लिए मजबूर कर देती है। हैरी को मजबूरन उसका साथ देना पड़ता है। इस खोज के दौरान दोनों की मनोस्थिति और उन…

इमरजेंसी के उन्नीस महीनों की दास्तान 'इंदु सरकार'

राजीव रंजन

कलाकार: कीर्ति कुल्हरी, नील नीतिन मुकेश, तोतारॉय चौधरी, अनपुम खेर, शीबा चड्ढा, जाकिर हुसैन, सुप्रिया विनोद, प्रवीण डबास, अंकुर विकल
निर्देशक: मधुर भंडाकर
लेखन व पटकथा: अनिल पांडेय और संजय छेल
संगीत: बप्पी लाहिड़ी और अनु मलिक
रेटिंग: ढाई स्टार


हमारे यहां पोलिटिकल फिल्में न के बराबर बनती हैं। दरअसल ऐसी फिल्मों को लेकर इतने विवाद खड़े कर दिए जाते हैं कि निर्माता ऐसे विषयों को हाथ लगाने से कतराते हैं। मधुर भंडारकर निर्देशित 'इंदु सरकार' भी एक पोलिटिकल ड्रामा है, जिसे लेकर काफी विवाद खड़े हुए। हालांकि मधुर खुशकिस्मत हैं कि उनकी फिल्म कुछ कट के साथ शुक्रवार को रिलीज हो गई, वर्ना कई फिल्में तो थियेटरों का मुंह तक नहीं देख पाईं।

बहरहाल, 'इंदु सरकार' फिल्म का नाम द्विअर्थी है। इस मायने में, कि जैसा नाम से जाहिर होता है, इंदु सरकार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके मुख्य किरदार का नाम इंदु सरकार है और उस किरदार का इंदिरा गांधी से कोई लेना-देना नहीं। इस फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री को बस एक सीन में दिखाया गया है, वह भी बिना किसी संवाद के। हालांक…

एक फ्रेंड रिक्वेस्ट जो एक्सेप्ट ना हो सकी

राजीव रंजन
करीब करीब मेरे सभी करीबी दोस्त फेसबुक पर हैं। शशांक भी फेसबुक पर आ गया था, लेकिन मेरी आभासी मित्रता सूची में नहीं था। एक दिन मैंने उसकी आईडी सर्च की और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। कुछ महीने पहले की बात थी। बार-बार देखता था कि उसने एक्सेप्ट की या नहीं। जब भी देखता तो जवाब ‘नहीं’ में मिलता। उसकी इस बेजारी पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। साला जब अपने अकाउंट में झांकने की फुरसत या इच्छा ही नहीं थी, तो आईडी बनाई ही क्यों थी! लेकिन मुझे क्या पता था कि उसे तो काल ने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज रखी थी, मेरी रिक्वेस्ट स्वीकार करता भी कैसे। नालायक भयानक एक्सीडेंट का शिकार होकर आईसीयू में भर्ती था। पिछले तीन महीने से जिंदगी और मौत के बीच में झूल रहा था। कभी उम्मीद बंधती थी, कभी टूटती थी। और फिर सारे बंंधन तोड़ कर उसने मेरी रिक्वेस्ट की बजाय काल की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। दिन भी कौन-सा चुना, मेरे जन्मदिन वाला। 17 जुलाई। आज सबसे छोटी बहन छोटकी बुची (आरती) से पता चला।

एक आदत उसकी कभी नहीं सुधरी। जब भी हम किसी काम से जाते थे और रास्ते में उसे कोई परिचित मिल जाता था, तो उस तीसरे के कहने पर वह उसी के…

ये मुन्ना माइकल है और थोड़ा रैम्बो भी

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राजीव रंजन, नई दिल्ली
स्टार- ढाई स्टार
कलाकार: टाइगर श्रॉफ, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, निधि अग्रवाल, रोनित रॉय
निर्देशक : शब्बीर खान

माइकल जैक्सन ने अपने डांस से पूरी दुनिया में अनगिनत युवाओं को प्रेरित किया है। एमजे से प्रेरित होकर कई युवाओं ने डांस को अपना करियर बनाया। भारत में भी एमजे के दीवानों की कमी नहीं। अपने समय में बॉलीवुड के सबसे बड़े डांसिंग स्टार रहे मिथुन चक्रवती भी उनसे बहुत प्रभावित रहे हैं और उनके स्टेप्स करने की प्रैक्टिस भी किया करते थे। टाइगर श्रॉफ की ‘मुन्ना माइकल’ की प्रेरणा भी एमजे ही हैं। बस इसमें थोड़ा ‘रैम्बो’ को भी मिला दिया गया है।

माइकल (रोनित रॉय) एक डांसर है, जो फिल्मों में ग्रूप डांस करता है। वह माइकल जैक्सन का बहुत बड़ा फैन है। एक दिन उसे काम से निकाल दिया जाता है, क्योंकि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। उसी रात उसे एक लावारिस शिशु रास्ते में पड़ा मिलता है। माइकल बच्चे का नाम मुन्ना रखता है और उसे घर ले आता है। मुन्ना डांस से दीवानगी की हद तक प्यार करता है। वह अपने दोस्तों के साथ क्लब वगैरह में डांस की शर्त जीत कर पैसे कमाता है। मुन्ना के बाबा को एक गंभीर बीमारी हो…

बहुत प्यारा सा है ये जग्गा जासूस

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राजीव रंजन
3 स्‍टार
कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी
निर्देशक: अनुराग बसु
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती


एक कहावत है ‘देर आए दुरुस्त आए'। अनुराग बसु निर्देशित फिल्म ‘जग्गा जासूस’ पर ये कहावत सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद ठीक बैठती है। अनुराग की ये रणबीर कपूर-कैटरीना कैफ स्टारर फिल्म काफी समय से लटकी हुई थी, कई बार इसकी रिलीज की तारीखें बदली। एक समय तो ऐसा भी लगने लगा था कि यह फिल्म थियेटरों का मुंह देख भी पाएगी कि नहीं।
बहरहाल, यह साफ कर देना ठीक रहेगा कि भले ही इसके नाम में जासूस शब्द जुड़ा है, लेकिन यह पारम्परिक जासूसी फिल्मों जैसी नहीं है। ऐसा लगता है, अनुराग ने इस फिल्म को बच्चों को ध्यान में ज्यादा रख कर बानाया है। फिल्म की शुरुआत दिसंबर, 1995 के बहुचर्चित पुरुलिया हथियार कांड के संदर्भ से शुरू होती है और फिल्म का मूल विषय हथियारों की तस्करी से जुड़ा है लेकिन इसका प्रस्तुतीकरण एक आम जासूसी थ्रिलर जैसा नहीं है।

जग्गा (रणबीर कपूर) जन्म से अनाथ है और उसका लालन-पालन अस्पताल में होता है। उसी अस्पताल में एक दिन बादल बागची उर्फ टूटी फूटी (शाश्वत चटर्जी) भी भर्ती होता है। जग्गा…

मैम से मॉम का सफर और प्रतिशोध

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राजीव रंजन

नया क्या है? यह एक ऐसा सवाल है, जिससे हम बारहां रूबरू होते हैं। फिल्म ‘मॉम’ के मुताल्लिक ये सवाल किया जाए तो जवाब है- कुछ भी नया नहीं है। लेकिन... लेकिन... यहीं पर यह बात भी तो आती है... आप क्या कहते हैं, इससे ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि आप किस तरह कहते हैं। और इस कसौटी पर मॉम काफी हद तक खरी उतरती है। रुटीन कहानी होने के बावजूद यह फिल्म अपने प्रस्तुतीकरण की वजह से ज्यादातर समय बांधे रखती है।

फिल्म की शुरुआत स्कूल के दृश्य से होती है। देवकी (श्रीदेवी) बायोलॉजी की टीचर है। उसकी क्लास में उसकी सौतेली बेटी आर्या (सजल अली) भी है, जिसे उसका क्लासमेट मोहित भद्दे मैसेज करता है। देवकी उसका मोबाइल फेंक देती है। आर्या को देवकी अपनी बेटी मानती है, लेकिन देवकी को आर्या अपनी मां नहीं मानती। उसे मां की बजाय मैम कहती है। उसे लगता है कि उसके पिता आनंद सब्बरवाल (अदनान सिद्दीकी) उसकी मां को भूल गए हैं। उसे जाने-अनजाने लगता है कि ऐसा देवकी की वजह से हुआ है। लिहाजा वह देवकी की बेटी को तो स्वीकार कर लेती है, लेकिन देवकी को स्वीकार नहीं कर पाती। रिश्तों की इसी खींचतान के बीच एक दिन आर्या अपने दोस्…

मंटो की कहानियों जैसी तासीर नहीं पैदा कर पाती 'मंटोस्तान'

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राजीव रंजन
बंटवारे की स्याह हकीकत को अगर किसी ने सबसे ज्यादा प्रामाणिकता के साथ अपनी कहानियों में बयां किया है तो वह हैं सआदत हसन मंटो। उनकी कहानियों में बंटवारे के समय के हालात, लोगों की बेचारगी, लोगों की दरिंदगी इस नंगे और तल्ख रूप में सामने आती है कि रूह बेचैन हो जाती है। उनकी कहानियां एक बार पढ़ने के बाद हमेशा के लिए जेहन में बस जाती है। मंटो की कहानियों की तासीर ही ऐसी है कि वे पढ़ने वाले को झकझोर कर रख देती है।

कभी-कभी तो लगता है कि उनके लेखन में इतनी तल्खी क्यों भरी है। इस सवाल का मंटो इन शब्दों में जवाब देते हैं- ‘जमाने के जिस दौर से हम इस वक्त गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां है, वो इस अहद (समय) की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर (रचना) में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स (त्रुटि) को मेरे नाम से मंसूब (संबंधित) किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम (व्यवस्था) का नुक्स है- मैं हंगामा पसंद नहीं। मैं लोगों के खयालातों-जज्बात में हैजान (अशांति) पैदा करना नहीं चाहत…

भय का माहौल रचने में नाकाम 'दोबारा'

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राजीव रंजन

आप किसी फिल्म के बारे में यह सोच कर जाते हैं कि वह एक हॉरर फिल्म है, और पूरे समय यह इंतजार करते रह जाते हैं कि बदन में झुरझुरी अब होगी, अब होगी। अब रोंगटे खड़े होंगे, लेकिन अंत तक ऐसा होता नहीं और आखिर आप ठगा हुआ-सा महसूस करते हुए सिनेमाहॉल से बाहर आ जाते हैं। 'दोबारा: सी योर ईविल' दर्शकों के साथ ऐसा ही बर्ताव करती है। बस एकाध सीन अपवाद के रूप में मान सकते हैं।

'दोबारा' 2014 में आई हॉलीवुड फिल्म 'ऑक्यूलस' का हिंदी रीमेक है और इसके निर्देशक माइक फ्लैनेगन 'दोबारा' से कार्यकारी निर्माता के रूप में जुड़े हुए हैं। फिल्म का पूर्वाद्र्ध बहुत धीमा है। उत्तराद्र्ध कुछ उम्मीद जगाता है, लेकिन निर्देशक घटनाओं को असरकारक तरीके से पेश नहीं कर पाते, लिहाजा फिल्म गति नहीं पकड़ पाती।

फिल्म की कहानी एक अभिशप्त आईने से जुड़ी हुई है, जिसके चलते नताशा (हुमा कुरेशी) व कबीर मर्चेंट (साकिब सलीम) का परिवार बर्बाद हो जाता है। इसलिए नताशा उस आईने को नष्ट करना चाहती है। इस काम में वह अपने भाई कबीर मदद मांगती है, लेकिन चीजें उसके अनुसार नहीं घटतीं।

एक तरह से देखा जाए तो इस म…

हंसाते-हंसाते बखिया उधेड़ती है 'हिंदी मीडियम'

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राजीव रंजन
‘भारत में अंग्रेजी एक भाषा नहीं, क्लास है।’ और इस क्लास में पहुंचने के लिए हर क्लास, खासकर हिंदी मीडियम वाला मिडिल क्लास कुछ भी करने को तैयार रहता है। विडंबना है कि अंग्रेजी को गरियाने वाला क्लास दिन-रात इस क्लास में पहुंचने की जुगत में लगा रहता है। आप किसी भी भाषा में पारंगत है, लेकिन आपको अंग्रेजी नहीं आती तो आपका ज्ञान व्यर्थ है। आप अपनी योग्यता और कड़ी मेहनत की बदौलत अच्छा-खासा कमाते-खाते हैं, लेकिन आपको अंग्रेजी नहीं आती तो सब बेकार। इरफान खान और सबा कमर स्टारर ‘हिंदी मीडियम’ इसी गंभीर मुद्दे को बड़े मनोरंजक अंदाज में पेश करती है।

राज बत्रा (इरफान खान) की चांदनी चौक में गारमेंट की बड़ी दुकान है, जहां वह प्रसिद्ध ड्रेस डिजाइनरों के डिजाइन किए किए हुए परिधानों की कॉपी बेचता है। वह अपने काम और माहौल से खुश है, लेकिन उसकी पत्नी मीता (सबा कमर) अपनी बेटी पिया (दीशिता सहगल) के भविष्य को लेकर काफी आशंकित रहती है। उसे लगता है कि उसकी बेटी का दाखिला अगर दिल्ली के टॉप इंग्लिश मीडियम स्कूल में नहीं हुआ तो वह अच्छी अंग्रेजी नहीं सीख पाएगी और अपने हमउम्र बच्चों से पिछड़ जाएगी। इससे उसके…

विश्वास की जीत की कहानी

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राजीव रंजन

‘कौन कहता है आसमां में सुराख नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों।’ अगर बहुत संक्षेप में ‘ट्यूबलाइट’ के बारे में बताना हो तो हिंदी गजल के सम्राट दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां सटीक बैठती हैं। इस फिल्म का मूल संदेश है- यकीन से पत्थर को भी हिलाया जा सकता है। इसी भाव के ईर्द-गिर्द पूरी फिल्म का ताना-बाना बुना गया है। यह युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी अमेरिकी फिल्म ‘लिटिल बॉय’ से प्रेरित है। बस अंतर ये है कि जहां ‘लिटिल बॉय’ पिता-पुत्र के प्यार की कहानी है, वहीं ‘ट्यूबलाइट’ में निर्देशक कबीर खान ने दो भाइयों के प्यार की कहानी को आधार बनाया है।

कुमायूं क्षेत्र (वर्तमान में उत्तराखंड) के जगतपुर गांव में दो भाई हैं लक्ष्मण सिंह बिष्ट (सलमान खान) और भरत सिंह बिष्ट (सोहेल खान)। उनके माता-पिता का बचपन में ही देहांत हो गया था। रामायण के विपरीत यहां लक्ष्मण बड़ा है और भरत छोटा। लक्ष्मण को सब ट्यूबलाइट कहते हैं, क्योंकि उसे कोई भी बात जल्दी समझ में नहीं आती। वह थोड़ा मंदबुद्धि है।

लक्ष्मण उम्र में तो बड़ा है, लेकिन बड़े भाई का कर्तव्य छोटा भाई भरत उठाता है। जब दोनों बच्चे थे, तब एक दिन …

मनोरंजन की ठीक-ठाक खुराक देते है बैंक चोर

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कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिनमें आप कुछ तलाशने की कोशिश न करें तो वो आपको मनोरंजन की ठीक-ठाक खुराक दे देती हैं। लेकिन जैसे ही आप उसमें तार्किकता, संदेश आदि ढूंढने की कोशिश करने लगते हैं, आपके हाथ से मनोरंजन भी फिसलने लगता है। यशराज की नई फिल्म ‘बैंक चोर’ भी एक ऐसी ही फिल्म है। इस फिल्म के बारे में एक बात और कही जा सकती है कि यह यशराज की ही ‘धूम’ सीरिज से बहुत प्रेरित है। हालांकि ‘धूम’ सीरिज का ट्रीटमेंट और फलक ‘बैंक चोर’ से बहुत बड़ा है। वैसे इतना तो कह ही सकते हैं कि यशराज ने अपना ही ईंट और रोड़ा उठा कर ‘बैंक चोर’ का कुनबा जोड़ा है।

चंपक (रितेश देशमुख) एक बैंक चोर है, जो अपने दो साथियों गेंदा (विक्रम थापा) और गुलाब (भुवन अरोड़ा) के साथ मिल कर बैंक चोरी करने जाता है। वहां तीनों जिस तरह की हरकते करते हैं, उससे बैंक के अंदर बंधकों को लगता है कि तीनों पहली बार बैंक चोरी करने आए हैं। इस बैंक चोरी से निबटने का जिम्मा सीबीआई ऑफिसर अमजद खान (विवेक ओबेरॉय) को दिया जाता है। उसे लगता है कि यह कोई मामूली बैंक चोरी नहीं है, बल्कि इसमें कोई बड़ा खेल है।

मौका-ए-वारदात पर मीडिया का भी जमावड़ा है, जो पल-पल…