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वेब सीरीज पाताल लोक की समीक्षा

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सेक्यूलरिज्म का नया शाहकार ‘पाताल लोक’ राजीव रंजन निर्माता:  अनुष्का शर्मा निर्देशक:  अविनाश अरुण और प्रोसित रॉय लेखक:  सुदीप शर्मा कलाकर:  जयदीप अहलावत, नीरज काबी, अभिषेक सिंह, ईश्वाक सिंह, गुल पनाग, जगजीत संधू, आसिफ खान, मेरेम्बम रोनाल्डो सिंह, स्वस्तिका मुखर्जी, अनूप जलोटा, राजेश शर्मा, निहारिका लायरा दत्त, विपिन शर्मा, आकाश खुराना, मनीष चौधरी, बोधिसत्व शर्मा पाताल लोक का पहला सीन। मुख्य किरदार दिल्ली के आउटर यमुना पार थाने का इंस्पेक्टर हाथीराम चौधरी (जयदीप अहलावत) अपने जूनियर इमरान अंसारी (ईश्वाक सिंह) से कहता है- ‘ये जो दुनिया है न, उसमें तीन दुनिया है। सबसे ऊपर है स्वर्ग लोक, जिसमें देवता रहते हैं। बीच में धरती लोक, जिसमें आदमी रहते हैं और सबसे नीचे पाताल लोक, जिसमें कीड़े रहते हैं।’ ऐसा शास्त्रों में लिखा है, लेकिन उसने वॉट्सएप्प पर पढ़ा है। इस दुनिया में एक चौथा लोक भी है और भारत में तो यह बहुत जबर्दस्त लोक है। इसके बारे में हाथीराम चौधरी नहीं बताता, क्योंकि यह बताने की नहीं, दिखाने की चीज है और पूरी सीरीज में दिखाई भी देती है। और हां, ये न तो...

हर साल बढ़ रहा बॉलीवुड का बाजार

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हर साल बढ़ रहा बॉलीवुड का बाजार भारत में हर साल 20 से ज्यादा भाषाओं में 1,500 से ज्यादा फिल्में बनती हैं। दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में भारत के लोग देखते हैं। 2019 में भारत में 200 करोड़ से ज्यादा टिकटों की बिक्री हुई। कैसा रहा यह साल बॉलीवुड के लिए, बता रहे हैं  राजीव रंजन अगर फिल्मों की संख्या के लिहाज से देखें, तो भारतीय फिल्म उद्योग दुनिया में सबसे बड़ा है। भारत में हर साल 20 से ज्यादा भाषाओं में 1,500 से ज्यादा फिल्में बनती हैं। 2018 में भारत में 1,800 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण हुआ। दुनिया में सबसे ज्यादा फिल्में भारत के लोग देखते हैं। पिछले साल 210 करोड़ से ज्यादा टिकटों की बिक्री हुई भारत में। वित्तीय वर्ष 2018 में भारतीय फिल्म उद्योग 15,890 करोड़ रुपये का था, जबकि वित्तीय वर्ष 2017 में यह आंकड़ा 14,500 रुपये था। अभी भारतीय फिल्म उद्योग का बाजार करीब 17,500 करोड़ रुपये है। 2020 के अंत तक इसके 23,800 करोड़ रुपये हो जाने का अनुमान है। यह उद्योग 10 प्रतिशत से ज्यादा सालाना चक्रवृद्धि दर से बढ़ रहा है। उम्मीद है कि निकट भविष्य में यह वृद्धि दर 11.9 प्रतिशत तक पहुंच जाएगी। भार...

500 करोड़ी क्लब और चीन में दंगल

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राजीव रंजन बस कुछ घंटों में यह साल 2017 भी बीत जाएगा और हर बीते साल की तरह इसकी भी कुछ खट्टी मीठी यादें हमारे जेहन में रह जाएंगी। इस वर्ष जीवन के हर क्षेत्र में कुछ न कुछ उल्लेखनीय उपलब्धियां देखने को मिलीं। बॉलीवुड भी इस वर्ष दो ऐतिहासिक घटनाओं का गवाह रहा, जिसने भारतीय सिनेमा में ऐसा मील का पत्थर स्थापित किया है, जिसे पार करना आासान नहीं होगा। और इन उपलब्धियों का श्रेय जाता है ‘बाहुबली 2’ और ‘दंगल’ को। इन दोनों फिल्मों ने यह दिखाया कि भारतीय सिनेमा किन ऊंचाइयों पर जा सकता है। उसमें कितनी संभावनाएं हैं। वहीं कुछ सितारे इस दुनिया को अलविदा भी कह गए। ‘बाहुबली 2’ ने जहां घरेलू बॉक्स ऑफिस पर सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए, वहीं ‘दंगल’ ने चीन में ऐसा धमाल मचाया कि लोग हैरान रह गए। आमिर खान की ‘पीके’ ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर ‘300 करोड़ी क्लब’ की शुरुआत तो पहले ही कर दी थी और उनकी ‘दंगल’ (387 करोड़ रुपये) चार सौ करोड़ रुपये के करीब पहुंची थी, लेकिन वह ‘400 करोड़ी क्लब’ नहीं शुरू कर सकी। बॉलीवुड को इस क्लब का बेसब्री से इंतजार था। लेकिन ‘बाहुबली’ ने सीधे ‘500 करोड़ी क्लब’ की शुरुआत कर दी। हिंदी, त...

लखनऊ सेंट्रल: कलाकार अच्छे, कहानी कमजोर

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राजीव रंजन कलाकार: फरहान अख्तर, डायना पेंटी, रवि किशन, दीपक डोबरियाल, रोनित रॉय, राजेश शर्मा, जिप्पी ग्रेवाल, इनामुल हक, वीरेंद्र सक्सेना रेटिंग- 2.5 स्टार छोटे शहर के लोगों के बड़े सपने और उन सपनों के बीच आने वाली बाधाएं, उन बाधाओं पर जीत और अंतत: सपनों का साकार होना। इस थीम पर बॉलीवुड में कई फिल्में बनी हैं और उनमें से कुछ ने असर भी छोड़ा है। इसी कड़ी में बॉलीवुड की नई पेशकश है ‘लखनऊ सेंट्रल’। फिल्म के सह-लेखक व निर्देशक रंजीत तिवारी और लेखक असीम अरोड़ा ने एक ऐसी कहानी बुनने की कोशिश की है, जिसमें संजीदगी, मनोरंजन और रोमांच, सब पर्याप्त मात्रा में हो। उन्होंने इसे ‘मास’ और ‘क्लास’ दोनों के लिए बनाने की कोशिश की है, लेकिन चूक गए हैं। यह एक शुद्ध मसाला बॉलीवुड फिल्म बन कर रह गई है, जिसमें मसालों का चयन और अनुपात भी ठीक नहीं है। किशन मोहन गिरहोत्रा (फरहान अख्तर) उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद का एक आम नौजवान है। वह गायक बनना चाहता है। अपना बैंड बनाना उसका सबसे बड़ा सपना है। वह अपनी सीडी रिकॉर्ड करता है और प्रसिद्ध गायक-अभिनेता मनोज तिवारी को सुनना चाहता है, जो उसके शहर में कंसर्ट के लिए ...

खोपड़ी से काम मत लो! फूट जाएगी

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‘पोस्टर बॉयज’ की समीक्षा राजीव रंजन 2.5 स्टार कलाकार: सन्नी देओल, बॉबी देओल, श्रेयस तलपड़े, सोनाली कुलकर्णी, समीक्षा भटनागर, अश्विनी कलसेकर, भारती अचरेकर निर्देशक: श्रेयस तलपड़े पिछले शुक्रवार ‘मर्दानगी’ से जुड़ी भ्रांतियों पर एक फिल्म आई थी ‘शुभ मंगल सावधान’। इस हफ्ते भी ऐसे ही विषय से जुड़ी एक और फिल्म आई है ‘पोस्टर बॉयज’, जो नसबंदी के बारे में बात करती है। लेकिन गंभीरता से नहीं, चलताऊ हंसी-मजाक के साथ। इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे समाज में नसबंदी कराने वालों को ‘अच्छी नजर’ से नहीं देखा जाता। नसबंदी को ‘मर्दानगी बंदी’ के रूप में देखा जाता है। इस फिल्म का ताना-बाना इसी कथ्य के इर्द-गिर्द बुना गया है। एक गांव है जंगीठी, जो भाषा, भाव, माहौल के लिहाज से हरियाणा का कोई गांव लगता है। यहां रहते हैं रिटायर्ड फौजी जगावर सिंह (सन्नी देओल), स्कूल मास्टर विनय शर्मा (बॉबी देओल) और रिकवरी एजेंट अर्जुन सिंह (श्रेयस तलपड़े)। जगावर सेल्फी लेने के शौकीन है, मास्टर को कोई चीज बताते हुए बीच में ही भूल जाने की आदत है। अर्जुन को टशन झाड़ने की आदत है और वह रॉक स्टार के अंदाज़ में रहता है। उसके दो च...

‘अलीबाबा’ और ‘गुफा’ की रोचक दास्तान

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राजीव रंजन शुभ मंगल सावधान 3 स्टार कलाकार: आयुष्मान खुराना, भूमि पेडणेकर, सीमा पाहवा, बृजेंद्र काला, सुप्रिया शुक्ला, अंशुल चौहान निर्देशक: आर.एस. प्रसन्ना हाल-फिलहाल कुछ ऐसी फिल्में आईं हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया है कि शुष्क और नीरस हुए बगैर भी गंभीर मसलों पर बात की जा सकती है। एकदम मनोरंजक अंदाज में। ‘हिंदी मीडियम’, ‘टॉयलेट: एक प्रेम कथा’ इसका हालिया उदाहरण हैं। ‘शुभ मंगल सावधान’ भी ऐसी ही फिल्म है। यह ‘मर्दाना कमजोरी’ जैसे विषय को हल्के-फुल्के अंदाज में उठाती है, जिसके बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना हमारे समाज में अच्छा नहीं माना जाता। मुदित शर्मा (आयुष्मान खुराना) गुड़गांव में रहता है। सुगंधा (भूमि पेडणेकर) दिल्ली के मोती बाग में रहती है। दोनों की राहें नेहरू प्लेस में टकराती हैं। मुदित को सुगंधा अच्छी लगती है। सुगंधा को भी मुदित अच्छा लगता है। लेकिन समस्या यह है कि मुदित यह बात बता नहीं पाता और सुगंधा चाहती है कि मुदित पहल करे। एक दिन वह दोस्तों के कहने पर हिम्मत जुटाता है और सुगंधा से अपनी भावनाओं का इजहार करने जाता ही है कि बीच में उसे भालू पकड़ लेता है। आखिरकार ...

दूर तक सूंघने वाला बच्चा जासूस

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राजीव रंजन 2 स्‍टार (दो स्‍टार) कलाकार: खुशमीत गिल, सुरेखा सीकरी, सुष्मिता मुखर्जी, राजेश पुरी, अमोल गुप्ते लेखक व निर्देशक: अमोल गुप्ते लेखक, अभिनेता और निर्माता-निर्देशक अमोल गुप्ते को बच्चों से विशेष प्यार है। अब तक उन्होंने बच्चों को केंद्र में रख कर ही अपनी फिल्मों का ताना-बाना बुना है। चाहे बतौर लेखक 'तारे जमीन' पर हो या बतौर लेखक-निर्देशक 'स्टेनली का डब्बा' और 'हवा हवाई', इन सभी फिल्मों के केंद्र में बच्चे हैं। ' ' का कथानक भी बच्चों के ईर्द-गिर्द ही बुना गया है। मुम्बई की एक सोसाइटी में रहने वाले बच्चे सन्नी गिल (खुशमीत गिल) के परिवार का अचार का बिजनेस है और इस व्यवसाय के लिए अच्छी घ्राण शक्ति (सूंघने की क्षमता) जरूरी है, लेकिन सन्नी सूंघ नहीं सकता। सन्नी की दादी (सुरेखा सीकरी) इससे बहुत चिंतित हैं। वह सन्नी का इलाज कराने के लिए हर जुगत भिड़ाती है, पर कामयाबी नहीं मिलती। एक बड़ा डॉक्टर बताता है कि सन्नी के नाक की एक नस बंद है, लिहाजा वह कभी सूंघ नहीं सकता। सन्नी की इस कमी का उसके क्लासमेट मजाक उड़ाते हैं। एक दिन सन्नी घूमते-घूमते अपने स्कूल...

नवाज के कंधों पर राजनीति, गालियों और गोलियों की बंदूक

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राजीव रंजन 2.5 स्टार (ढाई स्टार) निर्देशक : कुषाण नंदी कलाकार : नवाजुद्दीन सिद्दीकी, विदिता बाग, जतिन गोस्वामी इन दिनों जब किसी फिल्म से नवाजुद्दीन सिद्दीकी का नाम जुड़ा होता है तो दर्शकों की उम्मीदें बढ़ जाती हैं। लेकिन उम्मीदें हर बार पूरी हों ही, यह जरूरी नहीं। चाहे कितना भी बड़ा भी कलाकार क्यों न हो, अकेले वह कमाल नहीं कर सकता। इसके ढेर सारे उदाहरण हैं। कुशान नंदी निर्देशित और नवाजुद्दीन स्टारर के साथ कुछ ऐसी ही है। इस फिल्म में कुषाण ने नवाज के कंधे पर बंदूक रख कर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ का नया संस्करण रचने की कोशिश की है। उन्होंने गालियां भी खूब इस्तेमाल की हैं, हिंसा भी खूब करवाई है और सेक्स का तड़का भी लगाया है, लेकिन वह असर पैदा नहीं कर पाए हैं, जो ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ में था। दरअसल फिल्म की पटकथा ढीली हो, प्रस्तुतीकरण में ताजगी न हो तो सारे मसाले होते हुए भी जायका जुबान पर नहीं चढ़ पाता। इस फिल्म में मसाले तो सारे हैं, लेकिन उनका कितना और कैसा इस्तेमाल किया जाए, इसे तय करने में निर्देशक कुषाण नंदी चूक गए। यही वजह है कि ‘बाबूमोशाय बंदूकबाज’ एक बेहतर फिल्म होने की संभावना लिए हो...

रोमांस और कॉमेडी में पगी बरेली की बर्फी

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राजीव रंजन तीन स्टार पिछले कुछ सालों में बॉलीवुड ने महानगरों के अलावा छोटे शहरों की कहानियों को भी प्रमुखता देनी शुरू कर दी है। दरअसल छोटे शहर की कहानियां और उनके किरदार एकरसता को तोड़ते हैं और दर्शकों को एक नए रस-रंग से रूबरू कराते हैं, अगर उन्हें ठीक तरीके से पेश किया जाता है तो। ‘बरेली की बर्फी’ भी एक ऐसी ही फिल्म है, जो उत्तर प्रदेश के छोटे शहर की पृष्ठभूमि में कही गई है। फिल्म के नाम से जाहिर ही है कि वह शहर बरेली है, जहां सालों पहले गिरे झुमके को दर्शक अब भी नहीं भूल पाए हैं। बॉलीवुड में बरेली ‘झुमके’ के लिए मशहूर है तो उत्तर भारत में यहां के बने बांस के फर्नीचर काफी मशहूर हैं। इसे बांस-बरेली भी कहते हैं। लेकिन बरेली का बर्फी से ऐसा क्या रिश्ता है, जिसके कारण बरेली को बर्फी से जोड़ कर फिल्म बनाई जाए! इसे जानने के लिए आपको थोड़ा इंतजार करना पड़ेगा। ‘बरेली की बर्फी’ की कहानी बरेली की एक लड़की बिट्टी मिश्रा (कृति सैनन) की कहानी है, जो वर्जनाओं को नहीं मानती। वह सिगरेट पीती है, बिजली विभाग में नौकरी करती है, ब्रेक डांस करती है और जिन्दगी को खुल कर जीना चाहती है। अपनी सीमाओं में वह ब...

जब हैरी मेट सेजल: नई बोतल में प्रेम कहानी की पुरानी शराब

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2 स्टार कलाकार: शाहरुख़ खान, अनुष्का शर्मा लेखक व निर्देशक: इम्तियाज़ अली सिनेमेटोग्राफी: के. यू. मोहनन निर्माता: गौरी खान 'जब हैरी मेट सेजल' फिल्म के नाम और इम्तियाज अली, फिल्म के निर्देशक के नाम से यह तय-सा था कि यह भी एक प्रेम कहानी होगी। यहां तक तो कोई समस्या नहीं है। उम्मीद थी कि इम्तियाज यह प्रेम कहानी एक अलग अंदाज में परोसेंगे, जिसके लिए वह जाने जाते हैं। समस्या यहीं से शुरू होती है। यह फिल्म इम्तियाज की बहुत कम (बल्कि न के बराबर) और यशराज व धर्मा के स्टाइल की ज्यादा लगती है। फिल्म की कहानी एम्स्टर्डम से शुरू होती है। हैरी (शाहरुख खान) एक टूर गाइड है। वह गुजरात के एक हीरा व्यापारी के परिवार को यूरोप के विभिन्न देशों में घुमाता है। सेजल (अनुष्का शर्मा) उसी हीरा व्यापारी की बेटी है, जिसकी सगाई इसी टूर के दौरान एम्सटर्डम में होती है। उसकी सगाई की अंगूठी कहीं खो जाती है, जिसके चलते मंगेतर से उसका झगड़ा हो जाता है। वह अंगूठी ढूंढने के लिए रुक जाती है और हैरी को अपने साथ चलने के लिए मजबूर कर देती है। हैरी को मजबूरन उसका साथ देना पड़ता है। इस खोज के दौरान दोनों की मनोस्थि...

ये मुन्ना माइकल है और थोड़ा रैम्बो भी

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राजीव रंजन, नई दिल्ली स्टार- ढाई स्टार कलाकार: टाइगर श्रॉफ, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, निधि अग्रवाल, रोनित रॉय निर्देशक : शब्बीर खान माइकल जैक्सन ने अपने डांस से पूरी दुनिया में अनगिनत युवाओं को प्रेरित किया है। एमजे से प्रेरित होकर कई युवाओं ने डांस को अपना करियर बनाया। भारत में भी एमजे के दीवानों की कमी नहीं। अपने समय में बॉलीवुड के सबसे बड़े डांसिंग स्टार रहे मिथुन चक्रवती भी उनसे बहुत प्रभावित रहे हैं और उनके स्टेप्स करने की प्रैक्टिस भी किया करते थे। टाइगर श्रॉफ की ‘मुन्ना माइकल’ की प्रेरणा भी एमजे ही हैं। बस इसमें थोड़ा ‘रैम्बो’ को भी मिला दिया गया है। माइकल (रोनित रॉय) एक डांसर है, जो फिल्मों में ग्रूप डांस करता है। वह माइकल जैक्सन का बहुत बड़ा फैन है। एक दिन उसे काम से निकाल दिया जाता है, क्योंकि उसकी उम्र ज्यादा हो चुकी है। उसी रात उसे एक लावारिस शिशु रास्ते में पड़ा मिलता है। माइकल बच्चे का नाम मुन्ना रखता है और उसे घर ले आता है। मुन्ना डांस से दीवानगी की हद तक प्यार करता है। वह अपने दोस्तों के साथ क्लब वगैरह में डांस की शर्त जीत कर पैसे कमाता है। मुन्ना के बाबा को एक गंभीर बीम...

बहुत प्यारा सा है ये जग्गा जासूस

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राजीव रंजन 3 स्‍टार कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी निर्देशक: अनुराग बसु संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती एक कहावत है ‘देर आए दुरुस्त आए'। अनुराग बसु निर्देशित फिल्म ‘जग्गा जासूस’ पर ये कहावत सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद ठीक बैठती है। अनुराग की ये रणबीर कपूर-कैटरीना कैफ स्टारर फिल्म काफी समय से लटकी हुई थी, कई बार इसकी रिलीज की तारीखें बदली। एक समय तो ऐसा भी लगने लगा था कि यह फिल्म थियेटरों का मुंह देख भी पाएगी कि नहीं। बहरहाल, यह साफ कर देना ठीक रहेगा कि भले ही इसके नाम में जासूस शब्द जुड़ा है, लेकिन यह पारम्परिक जासूसी फिल्मों जैसी नहीं है। ऐसा लगता है, अनुराग ने इस फिल्म को बच्चों को ध्यान में ज्यादा रख कर बानाया है। फिल्म की शुरुआत दिसंबर, 1995 के बहुचर्चित पुरुलिया हथियार कांड के संदर्भ से शुरू होती है और फिल्म का मूल विषय हथियारों की तस्करी से जुड़ा है लेकिन इसका प्रस्तुतीकरण एक आम जासूसी थ्रिलर जैसा नहीं है। जग्गा (रणबीर कपूर) जन्म से अनाथ है और उसका लालन-पालन अस्पताल में होता है। उसी अस्पताल में एक दिन बादल बागची उर्फ टूटी फूटी (शाश्वत चटर्जी) भी भर्ती होत...