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उसकी याद आती रही

राजीव रंजन याद नहीं करता उसे फिर भी याद आ जाता है मैं तो समझा था किताब में लिखा सबक है बस याद करने पे ही याद आएगा वो तो ज़िन्दगी की किताब निकला।

स्वीकारोक्ति

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राजीव रंजन मैं गोबर हूं। प्रेमचंद के उपन्यास गोदान का किरदार नहीं गाय-भैंस का गोबर। हां याद आया, गोदान में गाय भी तो थी बस समझ लीजिए उसी का गोबर अंग्रेजी में बड़ा प्यारा नाम है इसका "काऊ डंग केक" पर इसे खाता कोई नहीं। बहरहाल कई बार "गोबर" का भी जलवा होता है इससे लीपने से घर-आंगन शुद्ध हो जाता है पर वो वाला गोबर नहीं हूं गोबर से लक्ष्मी-गणेश भी बनते हैं पर वो वाला भी नहीं हूं। धनिया जिसे जमीन पर थाप कर गोइठा (उपले) बना लेती है बस वही गोबर हूं। फिर चुल्हें में झोंक दिया जाता है मुझे मैं जलता रहता हूं खाना पकता रहता है और फिर मैं राख बन जाता हूं और हां, खाने-पीने के बाद आखिर में उसी राख से बर्तन मांज लिए जाते हैं एक टिकट में दो खेला हो जाता है तृप्त आत्माएं कहती हैं गोइठा पर बना खाना सुस्वादु होता है और राख से बर्तन चमक जाते हैं अधिकांश "गोबरों" का हासिल यही है।

सिरा

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राजीव रंजन छूट गए बातचीत के सिरे को कोशिश करता हूं फिर से पकड़ने की। कहता हूं इस साल मौसम बहुत गर्म है हालांकि कहना चाहता था तुम कैसी हो। कहता हूं धरती तप रही है खेत सूने पड़े हैं हालांकि कहना चाहता था जीवन खाली-सा हो गया है। कहता हूं बारिश ने बहुत देर कर दी आने में हालांकि कहना चाहता था मैं प्रतीक्षा में था कि तुम आओगी। कहता हूं शायद इस बार जाड़ा भी कसके पड़ेगा हालां‍कि कहना चाहता था मेरे बिन कैसे बीते दिन तुम्हारे। कहता हूं प्रकृति इतनी कठोर तो नहीं थी पहले हालांकि कहना चाहता था भूल गई तुम मुझे बिल्कुल ही। कहता हूं अब मौसमों का कोई ईमान नहीं रहा हालांकि कहना चाहता था तुम भी तो कितना बदल गई। वह कहती है हवा पानी और जमीन सब दूषित हो गए हैं ओजोन परत में छेद हो गई है ऑस्ट्रेलिया जितनी महासगर में अल-नीनो खेल रहा है मौसमों से खेल इसलिए जाड़ा गर्मी बरसात का कोई ठिकाना नहीं रहा अब सोचता हूं उसने जो कहा शायद वही कहना चाहती थी। बातचीत का सिरा हाथ में आकर भी पकड़ में नहीं आता।

खत्‍म हो रहा है सब!

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राजीव रंजन खेत, खेत नहीं रहे नदी, नदी नहीं रही पहाड़ अब पहाड़ नहीं रहे हवा भी हवा नहीं रही, और जंगल तो शायद रहे ही नहीं। खेत अब भूख बन गए हैं नदी अब बाढ़ हो गई पहाड़ बौने और विधवा की मांग जैसे हवा जहरीली हो गई है इन दिनों सांस फूलने लगती है जंगल अब अपार्टमेंट हो गए हैं। क्‍योंकि आदमी अब आदमी नहीं रहा जबकि सबके होने के लिए आदमी का होना जरूरी था बहुत जरूरी।

क्‍या लिखूं?

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राजीव रंजन क्‍या लिखूं? वक्‍त इफरात में है और कलम में रोशनाई भी बहुत मगर दिल रोशन नहीं है क्‍या लिखूं? ये बरस भी गुजर गया कई और बरसों की तरह कई भरते जख्‍मों को हरा करके तो कुछ नए जख्‍म देके कुछ खुशियों के छीटें भी पड़े, पर ऐसे कि तपते रेगिस्‍तान में खो जाती हैं पानी की बूंदें जैसे। लिखने को तो वैसे लिख सकता हूं आफताब से भी ज्‍यादा सुर्ख घरों की दास्‍तान माहताब से भी ज्‍यादा रोशन चेहरों की चमक पर बीच में आ जाते हैं करोंड़ों तारीक़ मंज़र। लिखने को तो लिख सकता हूं आवाज की रफ्तार से भी तेज दौड़ते ‘कामयाब’ कदमों की कहानी पर याद आ जाती हैं कई कहानियां फंसी हैं जो अंतहीन अंधेरे सुरंगों में अपने अंत के इंतजार में। लिखने को तो बहुत कुछ है, लेकिन कई ‘लेकिन’ बीच में आ जाते हैं। ये अंधेरा हर तरफ है या मैं ही डूबा हुआ हूं अंधेरों में?

Ring out wild bells to the wild sky

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Ring out, wild bells, to the wild sky, The flying cloud, the frosty light; The year is dying in the night; Ring out, wild bells, and let him die. Ring out the old, ring in the new, Ring, happy bells, across the snow: The year is going, let him go; Ring out the false, ring in the true. Ring out the grief that saps the mind, For those that here we see no more, Ring out the feud of rich and poor, Ring in redress to all mankind. Ring out the want, the care, the sin, The faithless coldness of the times; Ring out, ring out thy mournful rhymes, But ring the fuller minstrel in. Ring out false pride in place and blood, The civic slander and the spite; Ring in the love of truth and right, Ring in the common love of good. Lord Alfred Tennyson

मां

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राजीव रंजन जब भी थका हारा और टूटा हूं कभी अपने आप से लड़ते-लड़ते कभी दुनिया से लड़ते-लड़ते कभी अपनाकर ठुकराए जाने पर इसी शब्‍द ने सहारा दिया है मां तुम वर्णन से परे हो। जब कभी सपने देखते-देखते डर कर जागा हूं नींद से, अपने आपको असहाय पाया है जब जीवन का बोझ उठाने में एक भी कदम संभल कर चल पाने में तुम्‍ही ने मुझको सहारा दिया है मुझको टूटने से बचाया है मां तुम वर्णन से परे हो। तुम्‍हे याद नहीं करता मैं ऐसे जब अकेला पाता हूं अपने को इस दम घोंट देने वाली भीड़ में तब यही रिश्‍ता याद आता है तब यही एकमात्र सहारा बन कर आता है मां तुम वर्णन से परे हो। और अंत में, कुपुत्रो जायेत् क्‍वचिदपि कुमाता न भवति- शंकराचार्य के क्षमास्‍तोत्रं से (पुत्र, कुपुत्र हो सकता है, लेकिन माता, कभी कुमाता नहीं होती)

मजबूरियों के शोर में

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राजीव रंजन चंद सिक्‍कों की खनक में सुनाई नहीं देती दूर बैठे अपनों की सदा मजबूरियों के शोर में दब जाती हैं सब आवाजें आत्‍मा की भी ईमान की भी

विजेंद्र अनिल की कविता 'हमरो सलाम लीहीं जी'

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विजेंद्र अनिल संउसे देसवा मजूर, रवा काम लीहीं जी रउवा नेता हईं, हमरा सलाम लीहीं जी रउवा गद्दावाली कुरुसी प बइठल रहीं जनता भेंड़-बकरी ह, ओकर चाम लीहीं जी रउवा पटना भा दिल्ली बिरजले रहीं केहु मरे, रउवा रामजी के नाम लीहीं जी चाहे महंगी बढ़े, चाहे लड़े रेलिया रउवा होटल में छोकरियन से जाम लीहीं जी केहू कछुओ कहे त महटिउवले रहीं रउवा पिछली दुअरिया से दाम लीहीं जी ई ह गांधी के देस, रउवा होई ना कलेस केहू कांपऽता त कांपे, रउआ घाम लीहीं जी।

शलभ श्रीराम सिंह की कविता 'जीवन बचा है अभी'

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शलभ श्रीराम सिंह जीवन बचा है अभी जमीन के भीतर नमी बरकरार है बरकरार है पत्‍थर के भीतर आग हरापन जड़ों के अन्‍दर सांस ले रहा है। जीवन बचा है अभी रोशनी खोकर भी हरकत में हैं पुतलियां दिमाग सोच रहा है जीवन के बारे में खून दिल तक पहुंचने की कोशिश में है। जीवन बचा है अभी सूख गए फूल के आस-पास है खुशबू आदमी को छोड़कर भागे नहीं हैं सपने भाषा शिशुओं के मुंह में आकार ले रही है। जीवन बचा है अभी।

डॉ. राही मासूम रजा की कविता ''मरसिया''

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मरसिया एक चुटकी नींद की मिलती नहीं अपने जख्‍मों पर छिड़कने के लिए हाय हम किस शहर में मारे गए। घंटियां बजती हैं जीने पर कदम की चाप है फिर कोई बेचेहरा होगा मुंह में होगी जिसके मक्‍खन की जुबां सीने में जिसके होगा एक पत्‍थर का दिल मुस्‍करा कर मेरे दिल का एक वरक ले जाएगा हाय हम किस शहर में मारे गए।

राही मासूम रजा की कविता 'वसीयत'

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वसीयत वसीयत क्‍या करूं आखिर न जाने मौत किस आलम आयेगी किसे मालूम वो मुख्‍तार (स्‍वच्‍छंद) या मजबूर आयेगी किसे मालूम हंसती-खेलती आयेगी या जख्‍मों से बिल्‍कुल चूर आयेगी वतन में- या वतन से दूर आयेगी वसीयत क्‍या करूं- किससे करूं आखिर बहुत मुमकिन है जिसके हाथ में ये दास्‍तां आये वो मेरी इस जुबां ही से वा‍किफ न हो! तो फिर आखिर वसीयत क्‍या करूं-किससे करूं आखिर सुना है मौत का एक दिन मुअय्यन (निश्चित) है-तो फिर होगा किसे परवा ... और ये दुनिया- ड्राइंगरूमों, कहवाखानों और बेजान मयखानों की ये दुनिया मुझे बिल्‍कुल भूला ही दे तो अच्‍छा है कि मेरी दास्‍तां में न जाने कितनी बार उसका नाम आयेगा कि मुझको और मेरे फन को डंसा है इन पुरानी नागिनों ने कहवाखानों और ड्राइंगरूमों की इन सालखुर्दा (वयोवृद्ध) नागिनों ने रूप में इन्‍सान के आकर मेरा फन मर गया, यारो मैं नीला पड़ गया यारो मुझे ले जाके गाजीपुर में गंगा की गोदी में सुला देना वो मेरी मां है वो मेरे बदन का जहर पी लेगी हजारों बार मुझको खो चुकी है वो मुझे खोकर वो फिर इक बार जी लेगी वो मेरी मां है वो मेरे बदन का जहर पी लेगी मगर शायद वतन से दूर मौत आये बहुत ही ...

If you call me

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Sarojini Naidu If you call me, I will come Swifter, O my love Than a trembling forest deer Or, a panting dove. Swifter than a snake that flies To the charmers thrall… If you call me, I will come Fearless what befall. If you call me, I will come Swifter than desire Swifter than the lightning’s feet Shed with plumes of fire Life’s dark tides may roll between Or, death’s deep charms divide If you call me, I will come.

Caprice

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Sarojani Naidu You held a wild flower in your finger tips Idly you pressed it into indifferent lips Idly you tore its crimson leaves apart… Alas! It was my heart. You held a wine cup in your finger tips Lightly you raised it to indifferent lips Lightly you drunk and flung away the bowl… Alas! It was my soul.

अनुभूति

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राजीव रंजन तुमको, छूआ नहीं जा सकता देखा नहीं जा सकता सिर्फ महसूस किया जा सकता है क्‍योंकि तुम तो अनुभूति मात्र हो. तुमको, पाकर भी साथ निभाया नहीं जा सकता क्‍योंकि तुम तो रेत की तरह हो, जो मुट्ठियों से फिसल जाती है और पैरों तले से सरक जाती है.

... इसलिए उदास हो जाता हूं

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राजीव रंजन कई बार उदास हो जाने को जी चाहता है कई बार उदासी बड़ी अच्‍छी लगती है कई बार दिन भर की चहल-पहल से उब कर जीने की जद्दोजहद में घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक के सफर से थक जाने के बाद बत्तियां बुझाकर चुपचाप लेट जाना अतीत की राहों पर चलना गुजरे लम्‍हों को फिर से गुनना और बीते वक्‍त को जी कर उदास हो जाना अच्‍छा लगता है जिंदगी का हासिल खुशी ही नहीं है कभी-कभी उदासी भी आदमी को जिंदा कर देती है। इसलिए कई बार उदास हो जाता हूं।

वीणा-वादिनी वर दे

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सूर्यकान्‍त त्रिपाठी 'निराला' वर दे वीणा-वादिनी वर दे। प्रिय स्वतंत्र रव, अमृत मंत्र नव भारत में भर दे। काट अंध उर के बंधन स्तर बहा जननि ज्योतिर्मय निर्झर कलुष भेद तम हर प्रकाश भर जगमग जग कर दे। वर दे वीणा-वादिनी वर दे... नव गति नव लय ताल-छंद नव नवल कंठ नव जलद मंद्र रव नव नभ के नव विहग वृंद को नव पर नव स्वर दे। वर दे वीणा-वादिनी वर दे...