विजेंद्र अनिल की कविता 'हमरो सलाम लीहीं जी'


विजेंद्र अनिल

संउसे देसवा मजूर, रवा काम लीहीं जी
रउवा नेता हईं, हमरा सलाम लीहीं जी

रउवा गद्दावाली कुरुसी प बइठल रहीं
जनता भेंड़-बकरी ह, ओकर चाम लीहीं जी

रउवा पटना भा दिल्ली बिरजले रहीं
केहु मरे, रउवा रामजी के नाम लीहीं जी

चाहे महंगी बढ़े, चाहे लड़े रेलिया
रउवा होटल में छोकरियन से जाम लीहीं जी

केहू कछुओ कहे त महटिउवले रहीं
रउवा पिछली दुअरिया से दाम लीहीं जी

ई ह गांधी के देस, रउवा होई ना कलेस
केहू कांपऽता त कांपे, रउआ घाम लीहीं जी।

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