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मोमिन का शेर, ग़ालिब और इवान लेंडल

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राजीव रंजन तुम मिरे पास होते हो गोया जब कोई दूसरा नहीं होता। कुछ खोजते हुए बेसाख्ता इस शेर पर नजर पड़ गई। ये शेर मिज़र ग़ालिब के समकालीन अज़ीम शायर मोमिन खां  ‘ मोमिन ’   का है। मोमिन महान शायर तो थे ही ,  कहते हैं कि शतरंज के अच्छे खिलाड़ी और ज्योतिषी भी थे। यूं तो मोमिन ने कई अविस्मरणीय ग़ज़लें लिखी हैं। जैसेकि - ठानी थी दिल में अब न मिलेंगे किसी से हम पर क्या करें कि हो गए नाचार जी से हम हंसते जो देखते हैं किसी को किसी से हम मुंह देख देख रोते हैं किस बेकसी से हम   और एक ये भी - वो जो हम में तुम में क़रार था तुम्हें याद हो कि न याद हो वही या ’ नी वा ’ दा निबाह का तुम्हें याद हो कि न याद हो वो नए गिले वो शिकायतें वो मज़े मज़े की हिकायतें वो हर एक बात पे रूठना तुम्हें याद हो कि न याद हो कभी हम में तुम में भी चाह थी कभी हम से तुम से भी राह थी कभी हम भी तुम भी थे आश्ना तुम्हें याद हो कि न याद हो जिसे आप गिनते थे आश्ना जिसे आप कहते थे बा - वफ़ा मैं वही हूं  ' मोमिन '- ए - मुब्तला तुम्हें याद हो कि न याद हो लेकिन ...