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If you call me

चित्र
Sarojini Naidu

If you call me, I will come
Swifter, O my love
Than a trembling forest deer
Or, a panting dove.

Swifter than a snake that flies
To the charmers thrall…

If you call me, I will come
Fearless what befall.

If you call me, I will come
Swifter than desire
Swifter than the lightning’s feet
Shed with plumes of fire
Life’s dark tides may roll between
Or, death’s deep charms divide
If you call me, I will come.

Caprice

चित्र
Sarojani Naidu

You held a wild flower in your finger tips
Idly you pressed it into indifferent lips
Idly you tore its crimson leaves apart…
Alas! It was my heart.

You held a wine cup in your finger tips
Lightly you raised it to indifferent lips
Lightly you drunk and flung away the bowl…
Alas! It was my soul.

अनुभूति

चित्र
राजीव रंजन

तुमको,
छूआ नहीं जा सकता
देखा नहीं जा सकता
सिर्फ महसूस किया जा सकता है
क्‍योंकि तुम तो अनुभूति मात्र हो.

तुमको,
पाकर भी साथ
निभाया नहीं जा सकता
क्‍योंकि तुम तो रेत की तरह हो,
जो मुट्ठियों से फिसल जाती है
और पैरों तले से सरक जाती है.

गुजरे दिन कभी गुजरे नहीं

चित्र
राजीव रंजन

गुजरे दिन कभी गुजरे नहीं
हालात जो थे सुधरे नहीं.

पिरो कर रखता हूं सीने में
यादों के मोती बिखरे नहीं.

ताउम्र चलते रहे यूं ही
थक गए, मगर ठहरे नहीं.

सच को हर कदम पर कैद है
झूठ पर कोई पहरे नहीं.

सब कुछ है धुंधला-धुंधला सा
पहचाने से कोई चेहरे नहीं.

पत्रकारिता हमारी ढाल है और साहित्‍य आड़

राजीव रंजन

हमें गुमान है कि हम
लोकतंत्र के चौथे खंभे की
ईंट और गारे हैं.

हमें यह भी गुमान है कि
हम लोगों की आवाज हैं
ये बात और है कि
हमारी ही आवाज
बेमौत मर जाती है
या यूं कहें, हम ही खुद
घोट देते हैं उसका गला.

हम सिर्फ नौकरी करते हैं
हमारी एकमात्र चिंता है
नौकरी बची रहे
चाहे कुछ और बचे न बचे.

जब हम पर कोई सवाल उठाता है
हम उछाल देते हैं
उस पर ही कई सवाल.

हम पापी पेट की दुहाई देकर
न जाने कितने पाप
चुपचाप देखते रहते हैं.

हम पापी पेट के नाम पर
हर रोज न जाने कितने
पाप करते रहते हैं
और इन सारे ‘पापबोधों’ से
मुक्‍त होने के लिए
कविता लिख देते हैं.

पत्रकारिता हमारी ढाल है
साहित्‍य हमारी आड़।

(28/12/2006)

बदलते मौसम की उदासी!

चित्र
राजीव रंजन

इस दो दरवाजे वाले
किराये के कमरे में
हर चीज अपनी जगह से है
कुछ तरतीब से रखी हुई
और कुछ बेतरतीब सी
करीने से तह करके
टीन के बक्‍से में रखे कपड़े
रेक पर सजी हुईं किताबें
बिस्‍तर पर बिखरे धुले हुए कपड़े
फैले अखबार रिसाले और किताबें
छत से लटकता हुआ पंखा
सन्‍नाटे को तोड़ता हुआ
सन्‍नाटे को बढ़ाता हुआ
याद आती शरद ऋतु में
जेठ में बजती गांव की खामोशी
यह बदलते मौसम की उदासी है
या दिल ही है कुछ खोया-खोया सा।

(3/10/2006)

दिल्‍ली की दुनिया में एक दूसरी दुनिया- छंगपुरा

चित्र
ये छोटा सा राइट अप बहुत पहले लिखा था। चार सालों से ज्‍यादा का वक्‍त गुजर चुका है इसे लिखे। तब इस कॉलोनी में काफी आना-जाना होता था। बेरोजगारी के दिन थे। यहां जाने से वक्‍त भी कट जाता था और हौसला भी मिलता था कि कम से कम मैं निर्वासन तो नहीं झेल रहा। इस बस्‍ती के लोग दुख में भी उम्‍मीद के साथ जी रहे थे। साम्राज्‍यवादी चीन के शिकंजे से तिब्‍बत की आजादी के संघर्ष और सपने के साथ।

राजीव रंजन

न्‍यू अरुणा नगर कॉलोनी उर्फ छंगपुरा। पुरानी दिल्‍ली इलाके के तीमारपुर में बसी तिब्‍बती शरणार्थियों की एक बस्‍ती। आमतौर पर लोग इसे छंग बनाने और बेचने की एक जगह के रूप में जानते हैं। छंग यानी चावल से बनाई जाने वाली तिब्‍बती शराब। कीमत कम और नशा बढि़या। लेकिन, शायद कम ही लोग ही जानते हैं कि छंग बेचकर अपना गुजारा करने वाले लोग किस दु:ख में जी रहे हैं और किस उम्‍मीद में जिंदा हैं। यहां आकर नशे में डूबीं आंखें शायद नशा परोसने वालों की आंखों के सुनेपन को नहीं जान पातीं। नशे में डूबीं आंखें ये नहीं जान पातीं कि देश से निवार्सित होकर परदेस में जीने की पीड़ा क्‍या होती है ? या फिर परदेस में ही मर जाने का दर्द क्‍या…