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फिल्म ‘छिछोरे’ की समीक्षा

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मनोरंजन के साथ मुद्दे की बात राजीव रंजन निर्देशक: नितेश तिवारी कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत, श्रद्धा कपूर, वरुण शर्मा, प्रतीक बब्बर, ताहिर राज भसीन, नवीन पोलिशेट्टी, तुषार पांडे, सहर्ष शुक्ला, शिशिर शर्मा ढाई स्टार (2.5 स्टार) जिंदगी में जीतने की कोशिश सभी करते हैं, करनी भी चाहिए, लेकिन अगर किसी कारण से जीत नहीं पाए, तो उसके बाद क्या? इस ‘उसके बाद क्या’ का जवाब ढूंढ़ना भी बहुत जरूरी है, बल्कि ज्यादा जरूरी है। जीवन में जीत और हार के बीच में बहुत बड़ा स्पेस होता है। इस बीच के स्पेस में ही दुनिया की अधिसंख्य आबादी जी रही है और जीती है। बॉलीवुड की सबसे ज्यादा कमाऊ फिल्म ‘दंगल’ के निर्देशक नितेश तिवारी की फिल्म ‘छिछोरे’ का संदेश यही है। इस फिल्म में एक दृश्य है- अनिरुद्ध यानी एन्नी अपने इंजीनियरिंग कॉलेज के दोस्तों के साथ बैठा है। उसका बेटा राघव अस्पताल में जीवन और मौत की लड़ाई रहा है। एन्नी कहता है, ‘मैंने उससे (अपने बेटे) ये तो कहा था कि तेरे सिलेक्ट हो जाने के बाद बाप-बेटे साथ मिलकर शैम्पेन पिएंगे। लेकिन मैंने उससे ये नहीं कहा कि सिलेक्ट नहीं होने पर क्या करेंगे!’ इस सीन के जरिये ...

फिल्म ‘सोनचिड़िया’ की समीक्षा

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चंबल के डाकुओं और उस समय का सच राजीव रंजन कलाकार: मनोज बाजपेयी ,  सुशांत सिंह राजपूत ,  रणवीर शौरी ,  भूमि पेडणेकर ,  आशुतोष राणा निर्देशक: अभिषेक चौबे तीन स्टार ( 3  स्टार) करीब  20  साल पहले भिंड जिले (चंबल क्षेत्र) के निवासी एक दोस्त से डकैती फिल्मों पर बात हो रही थी। उसने व्यंग्य से कहा कि हिन्दी फिल्मों में बीहड़ के डाकुओं को घोड़े पर बैठ कर आते-जाते दिखाया जाता है। बॉलीवुड वाले चंबल देख लें ,  तो उनको समझ में आ जाएगा कि सच्चाई क्या है। डाकुओं के जीवन पर बॉलीवुड में ढेर सारी फिल्में बनी हैं और सफल भी रही हैं।  60  और  70  के दशक में तो ऐसी फिल्मों की भरमार थी। इन फिल्मों ने डाकुओं की छवि जो जनमानस में पेश की ,  वह सच्चाई से कोसों दूर है। इस प्रचलित छवि को तोड़ने का काम शेखर कपूर निर्देशित  ‘ बैंडिट क्वीन ’  और तिग्मांशु धूलिया निर्देशित  ‘ पान सिंह तोमर ’  ने किया। अभिषेक चौबे निर्देशित  ‘ सोनचिड़िया ’  भी काफी हद तक यह काम करती है। एक दौर था ,  जब चंबल के बीहड़ों में डाकु...

फिल्म ‘केदारनाथ’ की समीक्षा

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फिल्म में नहीं ,  सारा में है दम राजीव रंजन निर्देशक: अभिषेक कपूर कलाकार: सुशांत सिंह राजपूत ,  सारा अली खान ,  नीतीश भारद्वाज ,  निशांत दहिया ,  पूजा गौर ,  अल्का अमीन ,  सोनाली सचदेव ढाई स्टार ( 2.5  स्टार) पंद्रह जून , 2013  को आई भीषण बाढ़ ने उत्तराखंड के केदारनाथ में बेतरह तबाही मचाई थी। इसमें सैकड़ों स्थानीय लोगों के साथ हजारों तीर्थयात्री काल के गाल में समा गए। हजारों घर ,  दुकानें ,  होटल नेस्तनाबूद हो गए। इसके बाद बहस छिड़ गई कि पहाड़ी क्षेत्रों का अत्यधिक व्यवसायीकरण प्रकृति के प्रकोप का कारण बन रहा है। इसी मसले की पृष्ठभूमि में प्रेम कहानी को पिरोते हुए हुए निर्देशक अभिषेक कपूर ने अपनी फिल्म  ‘ केदारनाथ ’  का ताना-बाना बुना है। और हां ,  सेकुलरिज्म भी इस ताने-बाने के एक प्रमुख धागा है। मंसूर (सुशांत सिंह राजपूत) अपनी मां (अल्का अमीन) के साथ केदारनाथ घाटी में रहता है और पिट्ठू का काम करता है। वह हिन्दू तीर्थ यात्रियों को केदारनाथ के दर्शन करवाता है। उनसे ज्यादा पैसे नहीं लेता ,  बल्कि ...