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फिल्म ‘हाउसफुल 4’ की समीक्षा

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बिलकुल खाली है यह सितारों से फुल हाउस राजीव रंजन निर्देशक : फरहाद सम्जी कलाकार: अक्षय कुमार ,  बॉबी देओल ,  रितेश देशमुख ,  कृति सैनन ,  कृति खरबंदा ,  पूजा हेगड़े ,  चंकी पांडे ,  रंजीत ,  जॉनी लीवर ,  शरद केलकर ,  राणा डग्गूबटी ,  मनोज पाहवा,  नवाजुद्दीन सिद्दीकी  स्टार-  1.5 कुछ फिल्मों को लेकर निर्माता-निर्देशक आश्वस्त होते हैं कि उन्होंने कैसी फिल्म बनाई है ,  किसके लिए बनाई है। ऐसी फिल्मों के दर्शक भी आश्वस्त रहते हैं कि उन्हें क्या मिलने वाला है ,  इसलिए वे भी दिमाग घर पर छोड़ कर थियेटर में जाते हैं।  ‘ गोलमाल ’, ‘ धमाल ’, ‘ हाउसफुल ’  आदि फिल्में इसी श्रेणी की फिल्में होती हैं। इनसे दर्शकों को  ‘ लॉजिक ’  नहीं ,  बस कॉमेडी के  ‘ मैजिक ’  की उम्मीद होती है। लेकिन कॉमेडी का मैजिक भी न मिले ,  तो निराशा होती है।  ‘ हाउसफुल  4’  ऐसी ही फिल्म है। हैरी (अक्षय कुमार) अपने भाइयों मैक्स (बॉबी देओल) और रॉय (रितेश देशमुख) के साथ लंदन में एक ...

फिल्म 2.0 की समीक्षा

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तकनीक के जरिये तकनीक के खतरों की बात राजीव रंजन निर्देशक:  एस. शंकर बैनर:  लाइका प्रोडक्शंस कलाकार:  रजनीकांत, अक्षय कुमार, एमी जैक्सन, आदिल हुसैन, कैजाद कोतवाल, सुधांशु पांडेय संगीत:  ए.आर. रहमान ढाई स्टार (2.5 स्टार) तकनीकी प्रगति ने मनुष्य को बहुत सुविधाएं मुहैया कराई हैं, तो बहुत सारी परेशानियां भी पैदा की हैं। पर इसमें दोष तकनीक का नहीं, बल्कि उसके गलत इस्तेमाल का है। ‘रोबोट’ जैसी तकनीकी दृष्टि से उन्नत फिल्म के निर्देशक शंकर ने यह बात इसी फिल्म के सीक्वल ‘2.0’ के जरिये कहने की कोशिश की है। दरअसल, मनुष्य ने अपनी तात्कालिक जरूरतों की पूर्ति के लिए खुद पर मंडरा रहे दीर्घकालीन खतरों के प्रति आंखें मूंद ली हैं। आज मोबाइल लोगों के जीवन की सबसे बड़ी जरूरत बन गया है, लेकिन इसका रेडिएशन कितना बड़ा खतरा बन सकता है, हम इस पर थोड़ा भी सोचने को तैयार नहीं। जो एकाध लोग सोच रहे हैं, उनकी सुनने को कोई तैयार नहीं। ‘2.0’ की कहानी इसी विषय के ईर्द-गिर्द बुनी गई है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अपने नायाब नमूने चिट्टी (रजनीकांत) को विघटित करने के बाद डॉ. वशीकरण (रजनी...

दुनिया को ताकत दिखाने की कहानी

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फिल्म परमाणु की समीक्षा कलाकार: जॉन अब्राहम , बोमन ईरानी , डायना पेंटी , विकास कुमार , योगेंद्र टिक्कू , दर्शन पंड्या , अनुजा साठे निर्देशक: अभिषेक शर्मा तीन स्टार ( 3 स्टार) ‘ पोखरण 2’ भारत के सामरिक इतिहास में एक बड़ा मील का पत्थर है। 1998 में राजस्थान के पोखरण में हुए भारत के इस दूसरे परमाणु परीक्षण ने देश को एक पूर्ण परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया था। सबसे खास बात कि इस परमाणु परीक्षण की दुनियों को जरा भी खबर नहीं लगी। अमेरिका का बेहद सक्षम खुफिया तंत्र भी भारत के इस परमाणु परीक्षण के बारे में कुछ पता नहीं लगा सका। भारत की इस कामयाबी से बौखलाए अमेरिका ने भारत पर कठोर आर्थिक प्रतिबंध भी लगाए , लेकिन उसका नतीजा बेअसर ही रहा। इस तरह की कामयाबी कोई एक दिन या एक वर्ष का परिणाम नहीं होती। ऐसे लक्ष्यों को प्राप्त करने में दूरदर्शी योजना , रणनीति , वर्षों का परिश्रम , निष्ठा , दृढ़संकल्प की जरूरत होती। इसमें कई तरह के व्यवधान , समस्याएं भी सामने आती हैं और कई बार असफलता भी हाथ लगती है , लेकिन जब नेतृत्व दृढ़संकल्पित होता है तो सब बाधाएं पीछे छूट जाती हैं। जॉ...

एक पढ़े-लिखे आतंकवादी की कहानी

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फिल्म "ओमेर्ता" की समीक्षा राजीव रंजन कलाकार: राजकुमार राव, राजेश तैलंग, केवल अरोड़ा, टिमोथी रयान हिकरनेल निर्देशक: हंसल मेहता निर्माता: नाहिद खान स्टार- 2.5 (ढाई) निर्देशक हंसल मेहता और अभिनेता राजकुमार राव को एक-दूसरे का साथ बहुत पसंद है। 2013 में ‘शाहिद’ से लेकर 2018 में ‘ओमेर्ता’ तक पिछले पांच सालों में दोनों ने चार फिल्में साथ-साथ कर ली हैं और पांचवीं का एलान भी कर दिया है। दोनों की ताजा फिल्म ‘ओमेर्ता’ पाकिस्तानी मूल के एक ब्रिटिश आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख के जीवन पर आधारित है। इसमें 1994 में भारत में विदेशी नागरिकों के अपहरण, 1999 में कंधार विमान अपहरण के बाद तीन आतंकवादियों की रिहाई (जिसमें उमर भी शामिल था), 9/11 (11 सितंबर 2001 को अमेरिका पर आतंकवादी हमला), पाकिस्तान में अमेरिकी पत्रकार डेनियल पर्ल की हत्या और 2008 में मुंबई पर आतंकवादी हमले की घटनाओं को दिखाया गया है। कुछ बातें पहले ही साफ कर देते हैं, ‘ओमेर्ता’ शब्द का उमर नाम से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक इटालियन शब्द है, जिसका अर्थ है खामोशी। एक साजिश भरी खामोशी, जो अपराधी जांच अधिकारियों क...

जान नहीं है नानू की जानू में

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राजीव रंजन कलाकार: अभय देओल, पत्रलेखा, मनु ऋषि, राजेश शर्मा, बृजेंद्र काला, मनोज पाहवा, रेशमा खान निर्देशक: फराज हैदर निर्माता: साजिद कुरेशी लेखक: मनु ऋषि 1.5 स्टार (डेढ़ स्टार) ‘हॉरर कॉमेडी’ सुनने में बड़ा अच्छा लगता है। डर के साथ हंसी। देखने में भी अच्छा लगता, अगर दोनों को सही तरीके से मिलाया गया होता तो। लेकिन उसके लिए अच्छी स्क्रिप्ट, अच्छे निर्देशन और बढ़िया प्रस्तुतीकरण की जरूरत थी। दुर्भाग्य से फराज हैदर निर्देशित अभय देओल की ‘नानू की जानू’ में ऐसा हो नहीं पाया। लिहाजा फिल्म ‘भानुमति का कुनबा’ कुनबा बन कर रह गई, जिसमें ‘कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा’ लगा है। आनंद यानी नानू (अभय देओल) प्रॉपर्टी माफिया का एजेंट है। वह नोएडा में डब्बू (मनु ऋषि) और अपने कुछ सहयोगियों के साथ पहले मकान किराये पर लेता है, फिर उस पर कब्जा कर लेता है और मकान मालिक से औने-पौने दाम में जबर्दस्ती खरीद कर प्रॉपर्टी माफिया को दे देता है। एक दिन वह अपने काम के सिलसिले में अपनी गाड़ी से कहीं जा रहा होता है। रास्ते में उसे एक घायल लड़की सड़क पर पड़ी दिखती है। वह उसे अस्पताल ले जाता है, लेकिन लड़की बच नहीं...

देखने नहीं, महसूस करने वाली फिल्म है 'ऑक्टोबर'

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राजीव रंजन 3.5 स्टार (साढ़े तीन स्टार) कलाकार: वरुण धवन, बनिता संधू, गीतांजलि राव, साहिल वेडोलिया निर्देशक: शूजित सरकार निर्माता: रोनी लाहिरी, शील कुमार कहानी, पटकथा व संवाद: जूही चतुर्वेदी सिनमेटोग्राफी: अविक मुखोपाध्याय संगीत: शांतनु मोइत्रा, अभिषेक अरोड़ा और अनुपम रॉय संपादन: चंद्रशेखर प्रजापति कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जो मनोरंजन नहीं करतीं, मन को छू जाती हैं, मन में गहरे बैठ जाती हैं। शूजित सरकार निर्देशित ‘ऑक्टोबर’ भी ऐसी ही फिल्म है। प्रख्यात साहित्यकार अज्ञेय की प्रसिद्ध पंक्ति है- ‘दुख आदमी को मांजता है’। और जाहिर है, मंजने के बाद कोई भी चीज साफ हो जाती है, निर्मल हो जाती है। कई त्रासदियां हमें एक ज्यादा संवेदनशील मनुष्य बनाती हैं। फिल्म के नायक दानिश को भी त्रासदी ऐसे ही मांजती है और एक दर्शक के रूप में हम भी उस प्रक्रिया से अछूते नहीं रहते। और इस दौरान एक उम्मीद के टूट जाने के डर और फिर से जिंदा हो जाने की खुशी के बीच बार-बार आंखों में नमी महसूस करते हैं और कभी-कभी होठों पर निश्छल मुस्कराहट के कतरे भी। दानिश वालिया उर्फ डैन (वरुण धवन) दिल्ली के एक ...

कुछ मिसिंग है इस ‘मिसिंग’ में

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राजीव रंजन फिल्म समीक्षा: मिसिंग दो स्टार (2 स्टार) कलाकार: मनोज बाजपेयी, तब्बू, अन्नू कपूर निर्देशक: मुकुल अभ्यंकर निर्माता: मनोज बाजपेयी, शीतल भाटिया, नीरज पांडेय संगीत: एम.एम. क्रीम अगर किसी साइको-थ्रिलर मूवी में साइको थोड़ा कम हो, तो भी थ्रिल नाव पार लगा देता है। लेकिन अगर किसी साइको-थ्रिलर फिल्म में थ्रिल को गायब कर दिया जाए तो सारा मजा गायब हो जाता है। मनोज बाजपेयी और तब्बू की ‘मिसिंग’ से थ्रिल मिसिंग है, इसलिए यह फिल्म अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाती। यह कहानी है सुशांत दूबे (मनोज बाजपेयी) और अपर्णा (तब्बू) की। सुशांत रीयूनियन (हिन्द महासागर में एक द्वीप, जो फ्रांस का क्षेत्र है) का निवासी है और एक रात वह अपर्णा तथा तीन साल की बेटी तितली को लेकर क्रूज से मॉरीशस की राजधानी पोर्ट लुइस आता है। सुशांत वहां के एक खूबसूरत रिसॉर्ट में दो कमरों का स्वीट बुक कराता है। सुबह जब अपर्णा जगती है तो पाती है कि तितली कमरे से गायब है। वह सुशांत को बताती है। दोनों तितली को आसपास ढूंढ़ते हैं, लेकिन वह नहीं मिलती। वे रिसॉर्ट के स्टाफ को यह बात बताते हैं। रिसेप्शनिस्ट समझाती ह...

लाइट्स... कैमरा... एक्शन... और कट

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राजीव रंजन फिल्म: बागी 2 निर्देशक: अहमद खान संवाद: हुसैन दलाल और शान यादव कलाकार: टाइगर श्रॉफ, दिशा पटानी, मनोज बाजपेयी, रणदीप हुड्डा, दीपक डोबरियाल, प्रतीक बब्बर, दशर्न कुमार दो स्टार (2 स्टार) विस्तार में कुछ भी लिखने से पहले एक बात साफ कर देना जरूरी है। एक अभिनेता के तौर टाइगर श्रॉफ से आप क्या उम्मीद रखते हैं? अगर आप उनको उनके एक्शन और डांस के लिए पसंद करते हैं तो ‘बागी 2’ आपके लिए है। अगर आप उनसे अच्छे अभिनय की उम्मीद रखते हैं तो फिल्म देख कर नाउम्मीद होंगे। ‘बागी 2’ के नाम में बागी शब्द क्यों है, यह समझना थोड़ा मुश्किल है! अगर स्टंट को बगावत कहा जाता हो, तब तो ठीक है, वरना नाम से फिल्म का सम्बंध नहीं है। एक और बात, यह फिल्म ‘बागी’ का सीक्वल नहीं है। हां, यह जरूर है कि दोनों फिल्मों में प्रेम कहानी, अपहरण और एक्शन का प्लॉट कमोबेश एक जैसा है, लेकिन दोनों की कहानी एक-दूसरे से जुड़ी नहीं है। लिहाजा इसे फ्रेंचाइजी कहना ज्यादा ठीक होगा। दरअसल यह फिल्म 2016 की हिट तेलुगू फिल्म ‘क्षणम’ का हिंदी रीमेक है। रणवीर प्रताप सिंह उर्फ रॉनी (टाइगर श्रॉफ) फौजी है, जो कश्मीर ...

टाइगर लौटा है, ज्यादा धूमधड़ाके के साथ

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राजीव रंजन फिल्म: टाइगर जिंदा है निर्देशक: अली अब्बास जफर कलाकार: सलमान खान, कैटरीना कैफ, परेश रावल, कुमुद मिश्रा, अंगद बेदी, गिरीश कर्नाड, सज्जाद देलाफरोज, अनुप्रिया गोयनका रेटिंग: 2.5 स्टार वीडियो रिव्यू भारत और पाकिस्तान दोनों मुल्कों के आम लोग अमन पसंद हैं और वे नहीं चाहते कि दोनों मुल्क आपस में लड़ें। लेकिन ये बात दोनों देश के नेताओं के एजेंडे को सूट नहीं करती। यह विषय बॉलीवुड को काफी पसंद है और यही वजह है कि इस थीम को केंद्र में रख कर बॉलीवुड कई फिल्में बना चुका है। ‘टाइगर जिंंदा है’ और इसकी पहली किश्त ‘एक था टाइगर’ के केंद्र में भी यही विचार है। वैसे यशराज बैनर की ही यश चोपड़ा निर्देशित ‘वीर जारा’ का भी संदेश यही था। पर उस फिल्म में यह संदेश विशुद्ध प्रेम कहानी के जरिये दिया गया था, जबकि ‘टाइगर जिंदा है’ में यह संदेश एक्शन की जबरदस्त खुराक के साथ दिया गया है। हालांकि इसमें भी प्रेम है, पर एक्शन उस पर बहुत भारी है। यह फिल्म इराक में भारतीय नर्सों के अपहरण और उनके बचाव ऑपरेशन पर आधारित है। 'एक था टाइगर' में रॉ एजेंट अविनाश सिंह राठौड़ उर्फ टाइगर (सलमान खान)और आईए...

मजा वही, पर सादगी वैसी नहीं

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राजीव रंजन फिल्म: फुकरे रिटर्न्स 2.5 स्टार (ढाई स्टार) कलाकार: वरुण शर्मा, पुलकित सम्राट, ऋचा चड्डा, मनजोत सिंह, अली फजल, पंकज त्रिपाठी, प्रिया आनंद, विशाखा सिंह, राजीव गुप्ता निर्देशक: मृगदीप लाम्बा किसी सफल फिल्म के सीक्वल के साथ एक अच्छी बात यह होती है कि उसे लेकर लोगों में उत्सुकता बनी रहती है। इस तरह उसे एक शुरुआती लाभ मिल जाता है। लेकिन इसके साथ साथ एक जोखिम भी जुड़ा रहता है कि लोग उसकी तुलना पिछली फिल्म से करते हैं। और फिल्म उस कसौटी पर खरी नहीं उतरती तो नकार दी जाती है। ‘फुकरे रिटर्न्स’ को फायदा तो मिल ही चुका है और जहां तक तुलना की बात है तो फिल्म उस कसौटी पर भी निराश नहीं करती। हालांकि यह जरूर है कि 2013 में आई ‘फुकरे’ को लोगों ने उसके किरदारों व कहानी की जिस सरलता और गुदगुदाने वाली कॉमेडी के लिए पसंद किया था, वह ‘रिटर्न’ में नहीं मिलती। अगर कॉमेडी की बात करें तो वह पूरी तरह मौजूद है। शायद ही कोई ऐसा सीन हो, जिसमें हंसी की फुहारें नहीं हैं। लेकिन वो सादगी और सरलता ‘मिसिंग’ है। दरअसल पिछली फिल्म में जो नेताजी महज संदर्भ के लिए थे, इस बार वह कहानी का अहम हिस्सा ह...

वक्त की बर्बादी है ‘ये इंतजार’

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राजीव रंजन कलाकार: अरबाज खान, सनी लियोने, आर्य बब्बर, गौहर खान, सुधा चंद्रन निर्देशक: राजीव वालिया संगीत: राज आशू रेटिंग- 1 स्टार ये फिल्म क्यों बनाई गई है और किसके लिए बनाई गई है, पूरी फिल्म देखने के बाद भी इसका उत्तर खोज पाना बड़ा कठिन है। ये क्राइम-थ्रिलर है या हॉरर है या रोमांटिक फिल्म है, यह भी तय कर पाना कठिन है। हालांकि फिल्म का शुरुआती का दृश्य थोड़ी-बहुत उत्सुकता जगाने वाला है, अविश्वसनीय होने के बावजूद। लेकिन उसके बाद सारी चीजें इतनी घिसी-पिटी होती हैं कि कोफ्त होने लगती है। वीर सिंह राजपूत (अरबाज खान) एक पेंटर है। वह अपनी ड्रीम गर्ल की तस्वीर बनाता है। जब तस्वीर पूरी हो जाती है तो उसे ठीक तस्वीर वाली लड़की दिखाई देती है। उस लड़की का नाम रौनक (सनी लियोने) है। वीर उसका पीछा करता है। रौनक एक आर्ट क्यूरेटर है। वीर उसकी गैलरी में अपनी पेंटिंग की प्रदर्शनी लगाना चाहता है। रौनक उससे कहती है कि गैलरी में सिर्फ एक्सक्लूसिव पेंटिंग लगााई जाती हैं। वीर उसे अपनी ड्रीम गर्ल वाली पेंटिंग दिखाता है। रौनक यह देख कर हैरान हो जाती है। फिर दोनों में प्यार हो जाता है। दोनों ‘तुम मेरा साथ...

कड़वी हकीकत की मार्मिक कहानी

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राजीव रंजन साढ़े तीन स्टार फिल्म: कड़वी हवा निर्देशक: नीला माधब पांडा कलाकार: संजय मिश्रा, रणवीर शोरी, तिलोत्तमा शोम, भूपेश सिंह, एकता सावंत कला की सार्थकता तभी है, जब वह यथास्थिति को चुनौती दे। जब आप बेचैन हों तो आपको शांति से भर दे और जब आप निश्चेष्ट हों तो आपको बेचैन कर दे। नीला माधब पांडा की ‘कड़वी हवा’ बेचैन करती है। यह मनोरंजन नहीं करती है, लेकिन मन को झकझोरती है। और ऐसा झकझोरती है कि जब आप सिनेमाहॉल से निकलेंगे तो थोड़े हिले हुए तो जरूर होंगे। यह फिल्म दो भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों- चंबल इलाके के एक नेत्रहीन वृद्ध यानी बाबा (संजय मिश्रा) और ओडिशा के तटीय क्षेत्र के एक गांव के गन्नू (रनवीर शौरी) की कहानी है। दोनों प्रकृति की मार से सहमे अपने घर-परिवार को बचाने के लिए जी-जान से लगे हैं। एक की बेचैनी उसकी दयनीयता में प्रकट होती है और दूसरे की हृदयहीनता में। संजय मिश्रा सूखा प्रभावित बुंदेलखंड के एक गांव महुआ के निवासी हैं। उनके बेटे मुकुंद (भूपेश सिंह) पर बैंक का कर्ज चढ़ गया है। वह हमेशा कर्ज की चिंता से घिरा रहता है और बाबा इस चिंता से घिरे रहते हैं कि कहीं उनका बेटा दूसरे ...