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बदलते मौसम की उदासी!

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राजीव रंजन इस दो दरवाजे वाले किराये के कमरे में हर चीज अपनी जगह से है कुछ तरतीब से रखी हुई और कुछ बेतरतीब सी करीने से तह करके टीन के बक्‍से में रखे कपड़े रेक पर सजी हुईं किताबें बिस्‍तर पर बिखरे धुले हुए कपड़े फैले अखबार रिसाले और किताबें छत से लटकता हुआ पंखा सन्‍नाटे को तोड़ता हुआ सन्‍नाटे को बढ़ाता हुआ याद आती शरद ऋतु में जेठ में बजती गांव की खामोशी यह बदलते मौसम की उदासी है या दिल ही है कुछ खोया-खोया सा। (3/10/2006)

... इसलिए उदास हो जाता हूं

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राजीव रंजन कई बार उदास हो जाने को जी चाहता है कई बार उदासी बड़ी अच्‍छी लगती है कई बार दिन भर की चहल-पहल से उब कर जीने की जद्दोजहद में घर से ऑफिस और ऑफिस से घर तक के सफर से थक जाने के बाद बत्तियां बुझाकर चुपचाप लेट जाना अतीत की राहों पर चलना गुजरे लम्‍हों को फिर से गुनना और बीते वक्‍त को जी कर उदास हो जाना अच्‍छा लगता है जिंदगी का हासिल खुशी ही नहीं है कभी-कभी उदासी भी आदमी को जिंदा कर देती है। इसलिए कई बार उदास हो जाता हूं।

मोहाज़िर

राजीव रंजन देस बनाना चाहा था परदेस को देस छूट गया और परदेस परदेस ही रहा. बंट गया हूँ कई हिस्सों में. जिस्म लोटता है लहुलूहान होता है परदेस की मिटटी में. रूह भटकती है ठिकाना खोजती है देस की माटी में. वर्षों बीत जाते हैं परदेस को अपना बनाते पर हाथ लगता है सिर्फ एक मुश्त-ए-गुबार. एक मुद्दत के बाद देस भी बेगाना हो जाता है. तनहाइयों के सफर में भटकने वाले मुसाफिर यादों के मोहाज़िर होते हैं.

शून्य

राजीव रंजन जाड़े की सर्द हवा दरवाजों पर दस्तक देती है ऐसे जैसे कोई हलके हाथों से दरवाजा खटखटा रहा हो उठता हूँ सिगरेट की राख झाडते हुए दरवाजा खोलता हूँ लेकिन कुछ भी दिखाई नहीं देता हवा भी नहीं सिर्फ महसूस होती है उसकी चुभन और दिखता है केवल सिगरेट का खाली धुआं. फिर मैं झाड़ देता हूँ सिगरेट की बची राख.

कीमत

राजीव रंजन सुबह-सुबह खपरे की दरारों से घुस आती थी सूरज की किरणें रात को छन कर गिरती थी चांदनी इन्हीं दरारों से लेट कर ताकता रहता था इन्हीं दरारों को सूरज मुझे जगाता था चांदनी सुलाती थी मगर अब यह सब गुज़रे वक़्त की बात है बंद हो गई हैं दरारें राजधानी के कमरे में ईंट, गिट्टी और सरिये से नींद खुलती है अब घड़ी के अलार्म से आंख लगते-लगते बीत जाता है रात का तीसरा पहर महत्वाकांक्षाओं की कीमत चुकानी पडी है सूरज, चांदनी और नींद से

जवाब

राजीव रंजन एक ही सवाल कई बार मैंने कई तरह से पूछा इस उम्मीद में कि शायद जवाब कुछ अलग मिले मगर, हर बार अलग-अलग तरीकों से वही जवाब आया मैंने सवाल बदल दिया पर, जवाब वही रहा दरअसल, जवाब सवालों पर नहीं, जवाब देने वालों पर निर्भर करते है।