सिरा

राजीव रंजन



छूट गए बातचीत के सिरे को
कोशिश करता हूं फिर से पकड़ने की।
कहता हूं इस साल मौसम बहुत गर्म है
हालांकि कहना चाहता था तुम कैसी हो।
कहता हूं धरती तप रही है खेत सूने पड़े हैं
हालांकि कहना चाहता था जीवन खाली-सा हो गया है।
कहता हूं बारिश ने बहुत देर कर दी आने में
हालांकि कहना चाहता था मैं प्रतीक्षा में था कि तुम आओगी।
कहता हूं शायद इस बार जाड़ा भी कसके पड़ेगा
हालां‍कि कहना चाहता था मेरे बिन कैसे बीते दिन तुम्हारे।
कहता हूं प्रकृति इतनी कठोर तो नहीं थी पहले
हालांकि कहना चाहता था भूल गई तुम मुझे बिल्कुल ही।
कहता हूं अब मौसमों का कोई ईमान नहीं रहा
हालांकि कहना चाहता था तुम भी तो कितना बदल गई।
वह कहती है हवा पानी और जमीन सब दूषित हो गए हैं
ओजोन परत में छेद हो गई है ऑस्ट्रेलिया जितनी
महासगर में अल-नीनो खेल रहा है मौसमों से खेल
इसलिए जाड़ा गर्मी बरसात का कोई ठिकाना नहीं रहा अब
सोचता हूं उसने जो कहा शायद वही कहना चाहती थी।
बातचीत का सिरा हाथ में आकर भी पकड़ में नहीं आता।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बहुत प्यारा सा है ये जग्गा जासूस

मैम से मॉम का सफर और प्रतिशोध

विश्वास की जीत की कहानी