बहुत प्यारा सा है ये जग्गा जासूस



राजीव रंजन
3 स्‍टार
कलाकार: रणबीर कपूर, कैटरीना कैफ, शाश्वत चटर्जी
निर्देशक: अनुराग बसु
संगीत: प्रीतम चक्रवर्ती


एक कहावत है ‘देर आए दुरुस्त आए'। अनुराग बसु निर्देशित फिल्म ‘जग्गा जासूस’ पर ये कहावत सौ फीसदी तो नहीं, लेकिन काफी हद ठीक बैठती है। अनुराग की ये रणबीर कपूर-कैटरीना कैफ स्टारर फिल्म काफी समय से लटकी हुई थी, कई बार इसकी रिलीज की तारीखें बदली। एक समय तो ऐसा भी लगने लगा था कि यह फिल्म थियेटरों का मुंह देख भी पाएगी कि नहीं।
बहरहाल, यह साफ कर देना ठीक रहेगा कि भले ही इसके नाम में जासूस शब्द जुड़ा है, लेकिन यह पारम्परिक जासूसी फिल्मों जैसी नहीं है। ऐसा लगता है, अनुराग ने इस फिल्म को बच्चों को ध्यान में ज्यादा रख कर बानाया है। फिल्म की शुरुआत दिसंबर, 1995 के बहुचर्चित पुरुलिया हथियार कांड के संदर्भ से शुरू होती है और फिल्म का मूल विषय हथियारों की तस्करी से जुड़ा है लेकिन इसका प्रस्तुतीकरण एक आम जासूसी थ्रिलर जैसा नहीं है।

जग्गा (रणबीर कपूर) जन्म से अनाथ है और उसका लालन-पालन अस्पताल में होता है। उसी अस्पताल में एक दिन बादल बागची उर्फ टूटी फूटी (शाश्वत चटर्जी) भी भर्ती होता है। जग्गा हकलाता है, इसलिए बोलने में शर्माता है। टूटी फूटी उसे बताता है कि दिमाग के दो हिस्से होते हैं, एक बायां और एक दायां। बायें हिस्से से आदमी तार्किक तरीके से सोचता है और दायें हिस्से से वह बच्चों की तरह सोचता है, इसलिए क्रिएटिव होता है। वह जग्गा को कहता है कि वह गाकर कुछ कहेगा तो हकलाएगा नहीं। बागची, जग्गा को अपने साथ लेकर घर आ जाता है और पढ़ाई के साथ-साथ जिंदगी के सबक भी सिखाने लगता है। एक दिन उनके घर पुलिस पहुंच जाती है तो बागची, जग्गा को बोर्डिंग स्कूल में भर्ती करा कर कहीं चला जाता है। वैसे वह जग्गा को पैसे भेजता रहता है और बीएचएस कैसेट में रिकॉर्ड कर हर जन्मदिन पर बधाई संदेश भी भेजता है।

इधर जग्गा अपनी तीक्ष्ण बुद्धि का इस्तेमाल कर आसापास के छोटे-मोटे केस हल करते रहता है। इसी बीच रिपोर्टिंग के सिलसिले में एक रिपोर्टर श्रुति सेनगुप्ता (कैटरीना कैफ) जग्गा के शहर पहुंचती है और दोनों में दोस्ती हो जाती है। एक जन्मदिन पर बागची का जन्मदिन संदेश जग्गा के पास नहीं पहुंचता। उसे किशन (सौरभ शुक्ला), जिसके लिए टूटी फूटी काम करता था, से पता लगता है कि टूटी फूटी की मौत हो गई है। जग्गा को इस पर विश्वास नहीं होता। वह अपने पिता की तलाश के मिशन पर निकल पड़ता और उसके साथ होती है श्रुति।

फिल्म की पटकथा में कई झोल हैं और कई चीजें वेवजह भी लगती हैं। फिल्म करीब पौने तीन घंटे लंबी है, जिसे एडिटिंग टेबल पर आसानी से कम किया जा सकता था। शुरू में तो ऐसा लगता है कि ये फिल्म अनुराग-रणबीर की ‘बर्फी’ का विस्तार तो नहीं है, लेकिन बाद में यह ‘बर्फी’ के प्रभाव से बाहर निकल आती है। फिल्म के बहुत सारे संवाद गीतात्मक हैं। कई बार तो यह पता नहीं ही नहीं लगता कि गाना चल रहा है या संवाद बोले जा रहे हैं। खासकर पहले हाफ में। लेकिन यह प्रयोग रोचक है। फिल्म का संगीत अच्छा है और असर छोड़ता है। बैकग्राउंड संगीत कभी कभी बहुत लाउड हो जाता है, जिससे खीझ होने लगती है। फिल्म के लोकेशन बहुत अच्छे हैं और रवि वर्मन की सिनमेटोग्राफी भी शानदार है। फिल्म के ग्राफिक्स भी प्रभावकारी हैं।

रणबीर कपूर ने जग्गा जासूस के किरदार को बहुत मजेदार और दमदार तरीके से निभाया है। फिल्म उनके कंधों पर आगे बढ़ती है और वह हर सीन में प्रभाव छोड़ते हैं। उन्होंने बेहतरीन अभिनय किया है। उनका हकलाना हंसाता है (हालांकि कभी कभी ये थोड़ा ज्यादा लगता है) तो भावनात्मक दृश्यों में वह अपने अभिनय से भावुक कर देते हैं। नई पीढ़ी के अभिनेताओं में उनका अभिनय बिल्कुल अलग तरह का है। कैटरीना कैफ अपनी दूसरी फिल्मों से इसमें ज्यादा बेहतर लगी हैं। बिना ग्लैमर वाला उनका लुक लुभाता है। और शाश्वत चटर्जी... जिन्होंने उन्हें फिल्म ‘कहानी’ में निर्मम और भावहीन हत्यारे के रूप में देखा होगा, शाश्वत उनके जेहन में अब भी होंगे। और ‘जग्गा जासूस’ के टूटी फूटी के रूप में तो वह बहुत लंबे समय तक स्मृतियों में बने रहेंगे। इतना भावपूर्ण अभिनय बहुत कम देखने को मिलता है।

अगर दिमाग के दायें हिस्से से इस फिल्म को देखेंगे तो फिल्म अच्छी लगेगी। और बायें हिस्से से देखेंगे तो... वैसे हमारी सलाह है कि फिल्म देखने लायक है।
साभार: हिन्दुस्तान

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