एक फ्रेंड रिक्वेस्ट जो एक्सेप्ट ना हो सकी

राजीव रंजन

करीब करीब मेरे सभी करीबी दोस्त फेसबुक पर हैं। शशांक भी फेसबुक पर आ गया था, लेकिन मेरी आभासी मित्रता सूची में नहीं था। एक दिन मैंने उसकी आईडी सर्च की और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दी। कुछ महीने पहले की बात थी। बार-बार देखता था कि उसने एक्सेप्ट की या नहीं। जब भी देखता तो जवाब ‘नहीं’ में मिलता। उसकी इस बेजारी पर बड़ा गुस्सा आ रहा था। साला जब अपने अकाउंट में झांकने की फुरसत या इच्छा ही नहीं थी, तो आईडी बनाई ही क्यों थी! लेकिन मुझे क्या पता था कि उसे तो काल ने फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज रखी थी, मेरी रिक्वेस्ट स्वीकार करता भी कैसे। नालायक भयानक एक्सीडेंट का शिकार होकर आईसीयू में भर्ती था। पिछले तीन महीने से जिंदगी और मौत के बीच में झूल रहा था। कभी उम्मीद बंधती थी, कभी टूटती थी। और फिर सारे बंंधन तोड़ कर उसने मेरी रिक्वेस्ट की बजाय काल की फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट कर ली। दिन भी कौन-सा चुना, मेरे जन्मदिन वाला। 17 जुलाई। आज सबसे छोटी बहन छोटकी बुची (आरती) से पता चला।

एक आदत उसकी कभी नहीं सुधरी। जब भी हम किसी काम से जाते थे और रास्ते में उसे कोई परिचित मिल जाता था, तो उस तीसरे के कहने पर वह उसी के साथ किसी गैरजरूरी काम के लिए चल पड़ता था। मुझसे कहता- तू चल, हम आवतानी (तुम चलोे मैं आ रहा हूं)। ऐसा अकसर होता। मुझे बहुत तेज गुस्सा आता। मैं उसे बहुत गालियां देता, पर उसे उसकी परवाह थी कहां। वह अपना पेटेंट डायलॉग बोल कर निकल लेता- चुप रह, बहुत जरूरी काम बा, तोरा ना बुझाई। हम तुरंते आवतानी। (चुप रहो, बहुत जरूरी काम है, तुमको समझ में नहीं आएगा। मैं तुरंत आ रहा हूं)। उसका वो तुरंत घंटों बाद आता था। उसकी इस आदत से हम सब दोस्त बहुत परेशान रहते थे। इस बार भी उसने ऐसा ही किया। बीच रास्ते में हमारा साथ छोड़ कर कहीं और चल दिया। और इस बार तो उसने झूठा ही सही, तुरंत आने का वादा भी नहीं किया। बहुत गुस्सा आ रहा है, मगर गालियां किसकों दूं, वो तो सुनेगा नहीं।

अपने साथ वो मेरे दिल का एक खूबसूरत वरक भी फाड़ कर ले गया।

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