इमरजेंसी के उन्नीस महीनों की दास्तान 'इंदु सरकार'


राजीव रंजन

कलाकार: कीर्ति कुल्हरी, नील नीतिन मुकेश, तोतारॉय चौधरी, अनपुम खेर, शीबा चड्ढा, जाकिर हुसैन, सुप्रिया विनोद, प्रवीण डबास, अंकुर विकल
निर्देशक: मधुर भंडाकर
लेखन व पटकथा: अनिल पांडेय और संजय छेल
संगीत: बप्पी लाहिड़ी और अनु मलिक
रेटिंग: ढाई स्टार


हमारे यहां पोलिटिकल फिल्में न के बराबर बनती हैं। दरअसल ऐसी फिल्मों को लेकर इतने विवाद खड़े कर दिए जाते हैं कि निर्माता ऐसे विषयों को हाथ लगाने से कतराते हैं। मधुर भंडारकर निर्देशित 'इंदु सरकार' भी एक पोलिटिकल ड्रामा है, जिसे लेकर काफी विवाद खड़े हुए। हालांकि मधुर खुशकिस्मत हैं कि उनकी फिल्म कुछ कट के साथ शुक्रवार को रिलीज हो गई, वर्ना कई फिल्में तो थियेटरों का मुंह तक नहीं देख पाईं।

बहरहाल, 'इंदु सरकार' फिल्म का नाम द्विअर्थी है। इस मायने में, कि जैसा नाम से जाहिर होता है, इंदु सरकार पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर आधारित नहीं है, बल्कि इसके मुख्य किरदार का नाम इंदु सरकार है और उस किरदार का इंदिरा गांधी से कोई लेना-देना नहीं। इस फिल्म में पूर्व प्रधानमंत्री को बस एक सीन में दिखाया गया है, वह भी बिना किसी संवाद के। हालांकि यह कहना भी पूरी तरह ठीक नहीं होगा कि पूर्व प्रधानमंत्री से इस फिल्म का कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि यह फिल्म पूरी तरह आपातकाल पर आधारित है, जो इंदिरा गांधी ने ही लगाया था और इसका खामियाजा भी उन्हें चुनावों में भुगतना पड़ा था। लेकिन मधुर भंडारकर ने इस फिल्म में श्रीमती इंदिरा गांधी पर प्रत्यक्ष प्रहार नहीं किया है, बल्कि यह दिखाने की ज्यादा कोशिश की है कि आपातकाल में हुई ज्यादतियों के लिए संजय गांधी ज्यादा जिम्मेदार थे।

फिल्म आपातकाल के दौरान लोगों पर सरकारी अमले द्वारा किये गए अत्याचारों की तस्वीर पेश करती है। इसकी शुरुआत होती है आपातकाल के दौरान सरकार द्वारा चलाए गए कुख्यात नसबन्दी अभियान से। हालांकि फिल्म में उस स्थान का नाम तुर्कमान गेट की बजाय मोबिनपुरा दिखाया गया है। तुर्कमान गेट की भी पर्याप्त चर्चा है, लेकिन तथाकथित गैरकानूनी बस्ती के सन्दर्भ में, जहां लोगों के घरों पर बुलडोजर चला दिया गया था।

इंदु (कीर्ति कुल्हरी) एक अनाथालय में पली-बढ़ी लड़की है। वह हकलाती है, इसलिए कोई उसे अडॉप्ट नहीं करता। उसकी शादी भी इस वजह से नहीं हो पाती। एक दिन एक सरकारी अफसर नवीन सरकार (तोतारॉय चौधरी) उसके अनाथालय जाता है और कीर्ति से उसकी जान-पहचान होती है। दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगते हैं और शादी कर लेते हैं। इंदु शादी के बाद इंदु सरकार बन जाती है। 25 जून 1975 को देश में इमरजेंसी थोप दी जाती है और इंदु की जिन्दगी में उथल पुथल मच जाती है। फिल्म का समापन आपातकाल में बंदी बनाए सभी राजनैतिक कैदियों की रिहाई के साथ होता है।

फिल्म की पृष्ठभूमि मधुर भंडारकर ने मुख्य रूप से दिल्ली ही रखी है। जितने भी पात्र और घटनाएं इस फिल्म में हैं, करीब-करीब सब दिल्ली से ही जुड़े हुए हैं, एकाध अपवादों को छोड़ कर। आपातकाल पर फिल्में भले ही न बनी हों, लेकिन उसके बारे में काफी लिखा-पढ़ा गया है। लिहाजा आपातकाल के बाद की पीढ़ी भी भारतीय लोकतंत्र के इस इतिहास से अपरिचित नहीं है। इस फिल्म में भी दिखाई गई सारी घटनाएं पहले से ज्ञात हैं। मसलन- नसबंदी कार्यक्रम, प्रेस सेंसर, राजनैतिक विरोधियों का उत्पीड़न, किशोर कुमार के गानों पर पाबंदी, इंटेलिजेंस ब्यूरों के कहने पर चुनाव की घोषणा आदि। निर्देशक मधुर भंडारकर ने चीजों को जो है, जैसा है की तर्ज पर दिखाने की कोशिश की है और बहुत ज्यादा कल्पना का सहारा लेने की कोशिश नहीं की है। कई जगहों पर पर यह फिल्म भावनाओं को उद्वेलित करती है तो कई जगह उतना असर नहीं छोड़ पाती। निर्देशक ने इसका कैनवस बहुत छोटा रखा है और कई बार ऐसा लगता है कि इसे जल्दबाजी में बनाया गया है। इसलिए फिल्म वह असर नहीं छोड़ पाती, जिसकी उम्मीद थी। आपातकाल में सरकार के खिलाफ आंदोलनों के अगुआ लोकनायक जयप्रकाश नारायण की चर्चा भी इस फिल्म में नहीं है, सिर्फ एक बार उनका नाम लिया गया है।

इंदु सरकार के रूप में कीर्ति कुल्हरी का काम बहुत अच्छा है। उनके एक्सप्रेशन बहुत अच्छे हैं। उन्होंने प्रभावी अभिनय किया है। नवीन सरकार के रूप में तोतारॉय चौधरी भी प्रभावित करते हैं। संजय गांधी की भूमिका में नील नितिन मुकेश ने सधा हुआ अभिनय किया है। अनुपम खेर संघ प्रचारक और जनसंघ के प्रसिद्ध नेता नानाजी देशमुख से मिलते-जुलते किरदार नानाजी प्रधान की भूमिका में हैं। उनका किरदार संक्षिप्त है और अभिनय का वही चिर-परिचित अंदाज है, उसमें नयापन कुछ नहीं है। प्रवीण डबास आईबी ऑफिसर की संक्षिप्त भूमिका में हैं और ठीक हैं। जाकिर हुसैन थानेदार की भूमिका में ठीक लगे हैं। इसमें रुखसाना सुल्तान से मिलता-जुलता किरदार फरजाना है और जगदीश टाइटलर जैसा दिखने वाला भी एक किरदार है। सभी कलाकारों का अभिनय ठीक है।

फिल्म का संगीत और फिल्म के मूड के लिहाज से ठीक है। इसमें मशहूर कव्वाल अजीज नाजां की कालजयी कव्वाली 'चढ़ता सूरज धीरे-धीरे ढलता है ढल जाएगा' को रिक्रिएट किया गया है, जो बहुत अच्छी लगती है। फिल्म के बाकी पक्ष- संपादन, सिनमेटोग्राफी, बैकग्राउंड म्यूजिक भी ठीक हैं। हालांकि यह फिल्म मधुर भंडारकर की दूसरी फिल्मों 'सत्ता', 'चांदनी बार', 'फैशन,' 'पेज 3' के स्तर को नहीं छू पाती, लेकिन कुल मिला कर औसत से थोड़ी बेहतर फिल्म है।

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