भय का माहौल रचने में नाकाम 'दोबारा'


राजीव रंजन

आप किसी फिल्म के बारे में यह सोच कर जाते हैं कि वह एक हॉरर फिल्म है, और पूरे समय यह इंतजार करते रह जाते हैं कि बदन में झुरझुरी अब होगी, अब होगी। अब रोंगटे खड़े होंगे, लेकिन अंत तक ऐसा होता नहीं और आखिर आप ठगा हुआ-सा महसूस करते हुए सिनेमाहॉल से बाहर आ जाते हैं। 'दोबारा: सी योर ईविल' दर्शकों के साथ ऐसा ही बर्ताव करती है। बस एकाध सीन अपवाद के रूप में मान सकते हैं।

'दोबारा' 2014 में आई हॉलीवुड फिल्म 'ऑक्यूलस' का हिंदी रीमेक है और इसके निर्देशक माइक फ्लैनेगन 'दोबारा' से कार्यकारी निर्माता के रूप में जुड़े हुए हैं। फिल्म का पूर्वाद्र्ध बहुत धीमा है। उत्तराद्र्ध कुछ उम्मीद जगाता है, लेकिन निर्देशक घटनाओं को असरकारक तरीके से पेश नहीं कर पाते, लिहाजा फिल्म गति नहीं पकड़ पाती।

फिल्म की कहानी एक अभिशप्त आईने से जुड़ी हुई है, जिसके चलते नताशा (हुमा कुरेशी) व कबीर मर्चेंट (साकिब सलीम) का परिवार बर्बाद हो जाता है। इसलिए नताशा उस आईने को नष्ट करना चाहती है। इस काम में वह अपने भाई कबीर मदद मांगती है, लेकिन चीजें उसके अनुसार नहीं घटतीं।

एक तरह से देखा जाए तो इस मनोवैज्ञानिक हॉरर फिल्म का मुख्य पात्र अभिशप्त आइना है, लेकिन निर्देशक उसके जरिये भय का वातावरण रचने में खास सफल नहीं रहे हैं। अगर घटनाओं को सही तरीके से पेश किया गया होता, किरदारों को और अच्छी तरह उभारा गया होता और लाइट-साउंड का बेहतर तरीके से इस्तेमाल किया गया होता तो फिल्म अच्छी बन सकती थी। फिल्म का क्लाइमैक्स तो बहुत निराश करने वाला है, जो रही-सही कसर भी पूरी कर देता है।

नताशा व कबीर के पिता एलेक्स मर्चेंट के रूप में आदिल हुसैन बेहतरीन लगे हैं। उन्होंने एक अच्छे पति व पिता तथा एक बुरी आत्मा के प्रभाव में आ गए शख्स के अपने किरदार के दोनों रंगों को श्रेष्ठता के साथ निभाया है। हुमा और उनके असली भाई साकिब ने फिल्म में भी भाई-बहन के अपने किरदार को अच्छे-से निभाया है। दोनों की मां के रूप में लीसा रे भी ठीक हैं। आईने की अन्ना के रूप में मेडेलिना बेलारिव अच्छी लगी हैं।

कलाकारों के अभिनय के लिहाज से यह फिल्म ठीक है। लेकिन कुल मिलाकर, यह फिल्म अपने मूल मकसद में कामयाब नहीं हो पाती है, जो था डर पैदा करना।
साभार : हिंदुस्तान

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