मंटो की कहानियों जैसी तासीर नहीं पैदा कर पाती 'मंटोस्तान'


राजीव रंजन
बंटवारे की स्याह हकीकत को अगर किसी ने सबसे ज्यादा प्रामाणिकता के साथ अपनी कहानियों में बयां किया है तो वह हैं सआदत हसन मंटो। उनकी कहानियों में बंटवारे के समय के हालात, लोगों की बेचारगी, लोगों की दरिंदगी इस नंगे और तल्ख रूप में सामने आती है कि रूह बेचैन हो जाती है। उनकी कहानियां एक बार पढ़ने के बाद हमेशा के लिए जेहन में बस जाती है। मंटो की कहानियों की तासीर ही ऐसी है कि वे पढ़ने वाले को झकझोर कर रख देती है।

कभी-कभी तो लगता है कि उनके लेखन में इतनी तल्खी क्यों भरी है। इस सवाल का मंटो इन शब्दों में जवाब देते हैं- ‘जमाने के जिस दौर से हम इस वक्त गुजर रहे हैं, अगर आप उससे नावाकिफ हैं तो मेरे अफसाने पढ़िए। अगर आप इन अफसानों को बर्दाश्त नहीं कर सकते तो इसका मतलब है कि यह जमाना नाकाबिले-बर्दाश्त है। मुझमें जो बुराइयां है, वो इस अहद (समय) की बुराइयां हैं। मेरी तहरीर (रचना) में कोई नुक्स नहीं। जिस नुक्स (त्रुटि) को मेरे नाम से मंसूब (संबंधित) किया जाता है, दरअसल मौजूदा निजाम (व्यवस्था) का नुक्स है- मैं हंगामा पसंद नहीं। मैं लोगों के खयालातों-जज्बात में हैजान (अशांति) पैदा करना नहीं चाहता। मैं तहजीबो-तमद्दुन (सभ्यता और समाज) की और सोसायटी की चोली क्या उतारूंगा, जो है ही नंगी। मैं उसे कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं करता, इसलिए कि यह मेरा काम नहीं...’।

ऐसी बेबाकी से समाज की बखिया उधेड़ने वाले इस अफसानानिगार मंटो की कहानियों पर आधारित है फिल्म ‘मंटोस्तान’। निर्देशक राहत काजमी ने दर्शकों को मंटो की दुनिया में ले जाने के लिए उनकी चार कालजयी कहानियों- ‘खोल दो’, ‘ठंडा गोश्त’, ‘एसाइनमेंट’ (गुरमुख सिंह की वसीयत) और आखिरी सैल्यूट को चुना है।

बंटवारे की पृष्ठभूमि में बुनी गई ये चारों कहानियां मंटो की सबसे चर्चित और प्रभावशाली कहानियों में शुमार हैं। इन चारों को मिलाकर निर्देशक राहत काजमी ने पटकथा बुनने की कोशिश की है। एक बात समझ नहीं आती कि निर्देशक ने मंटो की चार कहानियों को एक साथ फिल्म में पेश क्यों किया? मंटो की ये कहानियां अलग-अलग भी बंटवारे की त्रासदी को यथार्थ रूप में पेश करने में सक्षम हैं, फिर भी महज डेढ़ घंटे की फिल्म में चार कहानियों की जरूरत क्यों पड़ी, यह समझ पाना मुश्किल है।

फिल्म किसी बच्चे के क्लास की रुटीन के जैसी चलती है, जिसमें एक पीरियड के बाद दूसरा, तीसरा, चौथा, ऐसा ही क्रम चलता रहता है। फिल्म में पहला दृश्य एक कहानी से, दूसरा दृश्य दूसरी कहानी से, तीसरा दृश्य तीसरी कहानी से और चौथा दृश्य चौथी कहानी से। एक के बाद एक। क्लाईमैक्स भी इसी अंदाज में है। एक सीन से दर्शक जुड़ भी नहीं पाता कि दूसरा सीन शुरू हो जाता है। दृश्यों का ऐसा आयोजन फिल्म की निरंतरता को भंग करता है। उकताहट पैदा करता है। किरदारों को अच्छी तरह से स्थापित नहीं किया गया है, जैसाकि मंटो अपनी हर कहानी में करते हैं। इसी वजह से फिल्म संवेदनाओं को जागृत नहीं कर पाती है।

मंटो की कहानियां पढ़ कर नसें झनझना जाती हैं, लेकिन इस फिल्म को देखते हुए कभी ऐसा महसूस नहीं होता, एकाध अपवादों को छोड़ दें तो। हां, ‘खोल दो’ कहानी के पात्र सिराजुद्दीन के रूप में रघुबीर यादव जरूर असर पैदा करने की कोशिश करते हैं, लेकिन निर्देशक उनके अनुभव और क्षमता का पूरा फायदा नहीं उठा पाता। फिल्म के सभी मुख्य पात्रों का अभिनय बढ़िया है।
‘एसाइनमेंट’ के जज साहब के रूप में वीरेंद्र सक्सेना अपने किरदार से पूरा न्याय करते हैं। वहीं ‘ठंडा गोश्त’ की कुलवंत कौर के किरदार के शेड्स को सोनल सहगल ने पर्दे पर अच्छे से उकेरा है। शोएब भी इस्सरसियां के किरदार में ठीक हैं। ‘आखिरी सैल्यूट’ के मुख्य किरदार रब नवाज को निर्देशक राहत काजमी ने खुद निभाया है। काजमी का अभिनय ठीक-ठाक है। फिल्म के संवाद अच्छे हैं, जो कहानियों से ज्यों के त्यों लिए गए है। हां, चार कहानियों को एक साथ दिखाने के लिए पटकथा में थोड़ी-बहुत चीजें जोड़ी गई हैं, लेकिन इससे कहानियों के मूल स्वरूप पर कोई असर नहीं पड़ा है। फिल्म में एक ही गाना है, जो ठीक है।

कुल मिला कर यह फिल्म प्रभावित नहीं करती। अगर आपने मंटो की इन कहानियों को पढ़ा है तो फिल्म देख कर निराशा होगी। इन कहानियों की जो तासीर है, उसका दसवां हिस्सा भी निर्देशक फिल्म में पैदा नहीं कर पाए हैं। इसमें एक अच्छी फिल्म होने की तमाम संभावनाएं मौजूद थीं, लेकिन निर्देशक चूक गए और यह अति साधारण फिल्म बन कर रह गई।

साभार : हिंदुस्तान

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