आतंकियों और आर्मी को एक ही पलड़े में रखती है ‘हैदर’

राजीव रंजन
रिलीज के करीब 3 महीने बाद देखी ‘हैदर’, रिलीज के तुरंत बाद की आलोचनाओं और प्रशंसाओं के प्रभाव से मुक्त होकर। सिनेमाई संदर्भों में बात करें तो बेहतरीन फिल्म है। कमाल का निर्देशन, कमाल का प्रस्तुतिकरण, बेहद कसी पटकथा, शानदार सिनमेटोग्राफी। किरदारों और कश्मीर के इमोशन का प्रभावशाली ढंग से चित्रण। शेक्सपियर के ‘हेमलेट’ का सधा हुआ रूपातंरण। अब तक के अपने करियर में शाहिद कपूर अपने अभिनय के चरम पर दिखे, श्रद्धा कपूर का अभिनय भी उत्कृष्ट है। भावनाओं के भयानक द्वंद्व में फंसी स्त्री के किरदार को तब्बू ने जीवंत कर दिया है। फिल्म के क्लाइमैक्स में पीठ पर बम बांधे वह ‘माचिस’ और के तब्बू की याद दिलाती हैं। कुलभूषण खरबंदा, इरफान खान, केके मेनन हमेशा की तरह असरदार। गीत-संगीत भी उत्कृष्ट। बिना किसी मिलावट के कश्मीर का सौंदर्य अपने सहज और सच्चे रूप में मौजूद है। जो है, जैसा है की तर्ज पर। लेकिन जाने-अनजाने ‘हैदर’ आतंकवादियों और भारतीय आर्मी को एक ही पलड़े में रखती है। फिल्म यह तो बताती है कि आतंकीवादी भी मनुष्य हैं, लेकिन यह बताने में थोड़ी कंजूसी कर जाती है कि आतंकवादी जिसे मारते हैं, वे भी मनुष्य ही होते हैं। सिनेमाई उत्कृष्टता की कसौटियों पर खरी उतरने वाली यह फिल्म कश्मीर के हालात का एक ही पहलू दिखाती है। क्यों? इसका सटीक उत्तर फिल्म के निर्देशक और सह-लेखक विशाल भारद्वाज ही दे सकते हैं।

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