एक पियक्‍कड़ की डायरी

राजीव रंजन
(14 नवंबर, 2005 की रात)

यूं तो मैं एक पेशेवर पियक्‍कड़ नहीं हूं, लेकिन लक्षण बताते हैं कि मैं हो सकता हूं। दो दिन पहले मैंने ‘वोदका’ के तीन पेग लिए थे, लेकिन ‘कुछ’ हुआ नहीं। अगर साफ लफ्जों में कहूं तो तो नशा नहीं हुआ, बिल्‍कुल नहीं। हालांकि, मैंने एक साल बाद पी थी। नशे की तलब ने, या यूं कहें कि अपनी परेशानियों ने एक बार फिर पीने को मजबूर कर दिया। गो मेरी माली हालत ऐसी थी नहीं कि अपने मजबूरी के इस शौक को मैं पूरा कर सकूं। लेकिन कहते हैं न, ‘जहां चाह वहां राह।’ तो ऐसी सूरत निकल ही आई कि मैं अपना गुबार निकाल दूं। पिछले बार के अनुभव से सबक लेकर मैंने ‘वोदका’ से तोबा की और इस बार ‘रम’ लेकर आया। कुल चार जने थे और सामने था एक पूरा ‘फुल।’ एक बालक तो बीच में ही हाथ खड़े कर गया, बाकी बचे तीन।

इसी बीच मैं सब्‍जी भी बनाता रहा क्‍योंकि तब होटल से सब्‍जी-रोटी खरीदकर खाने की हैसियत नहीं थी। मैं बेरोजगार हो गया था। आसपास के लोग भी कड़की में ही दिन गुजार रहे थे। दारू का जुगाड़ अखबार बेचकर किया था। वैसे भी रम बहुत ज्‍यादा महंगी नहीं आती। करीब डेढ़ सौ रुपए में काम हो गया था और अखबार बेचकर इतनी रकम मिल गई थी, कुछ चखना भी आ गया था उस पैसे में। खैर, नशे के कार्यक्रम के बीच खाना बनाने का कार्यक्रम भी चलता रहा। खास बात यह कि खाना कुछ खास खराब नहीं बना। खाने-पीने के साथ बीच में ग़ज़ल भी चलती रही।
‘मैंने नज़रों से पी, पी नहीं जाम से
ये नशा वो नहीं जो उतर जाएगा।’
मगर, मेरा नशा उतर गया। उस बालक का हिस्‍सा- जिसने बीच में ही हाथ खड़े कर दिए थे- पी जाने के बाद भी। मेरे अलावा बचे दो लोग भी पीने के बाद सोने चले गए। मैं जागता रहा। सोने के बाद जब वे दोनों जगे तो उन्‍होंने उल्‍टी करने की मनसा जाहिर की। गनीमत यही थी कि उन्‍होंने कम से कम बाथरूम जाने की जहमत उठा ली। मैं उनके उल्‍टी करने की आवाज सुनता हूं ओर एक खोखली हंसी हंस देता हूं। वे दोनों अपना कार्यक्रम समाप्‍त कर फिर सो जाते हैं।

मेरे साथ रहने वाला एक लड़का, जो नहीं पीता है, (यूं तो मैं भी नहीं पीता हूं, आज की बात कुछ और है) अभी जाग रहा है। मैं बाहर जाता हूं और बची हुई तीन सिगरेटों में से एक फूंक कर वापस कमरे में आ जाता हूं। मैं अब यह सब लिखने के बाद 10 बजे सुबह (मेरी सुबह इसी समय होती है) का अलार्म लगा कर सोने की कोशिश करने लगता हूं। इस उम्‍मीद के साथ, कि कल सुबह जब मेरी आंख खुले, तो वह सुबह और सुबहों से कुछ अलग हो अलहदा हो।

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