फिल्म रिव्यू: शोले 3 डी

राजीव रंजन

शोले भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसी फिल्म है, जिसका जादू कभी फीका नहीं पड़ा। इस फिल्म के बारे में कहा जाता है कि जो सिनेमा में हो सकता है, वह सब ‘शोले’ में है और जो शोले में नहीं है, वह सिनेमा में हो ही नहीं सकता। यह फिल्म एक ऐसा सिनेमाई व्यंजन है, जिसमें मनोरंजन के सारे मसाले- ड्रामा, एक्शन, कॉमेडी, इमोशन, डांस, डायलॉग, गीत-संगीत सही मात्रा और अनुपात में हैं। वहीं फिल्म मेकिंग का क्राफ्ट भी परफेक्ट है। सधा निर्देशन, शानदार सिनेमेटोग्राफी, कसी स्क्रिप्ट, बेहतरीन एडिटिंग व फिल्म के मिजाज के अनुकूल लोकेशन। और हां, स्टार कास्ट की तो बात ही क्या! करीब 39 साल बाद ‘शोले’ एक बार फिर दर्शकों के सामने है, एक नए अवतार-3डी में। मूल फिल्म के दृश्यों से छेड़छाड़ नहीं की गई है। फिल्म की लंबाई वही है- 207 मिनट।

नए अवतार में फिल्म का प्रभाव बढ़ गया है। कई दृश्य पहले के मुकाबले ज्यादा इफेक्ट डालते हैं। कास्टिंग में उड़ती तितलियां प्यारी लगती हैं। खास कर एक्शन दृश्यों में 3डी का इफेक्ट रोमांचक है। फिल्म के शुरू में डकैत मालगाड़ी को रोकने के लिए लकड़ियों का गट्ठर पटरियों पर रखते हैं और जब ट्रेन गट्ठर को रौंदते हुए आगे बढ़ती है तो उसका प्रभाव देखने लायक है। ऐसा लगता है, जैसे लकड़ियों के टुकड़े उछल कर दर्शकों को लग जाएंगे। हो सकता है कि इस सीन के समय आप अचानक अपनी गर्दन को दायें-बायें करने लगें। गोलीबारी के दौरान भी 3डी का फर्क साफ नजर आता है। बंदूकों से निकली गोलियां सिनेमा हॉल में छिटकती नजर आती हैं। ‘शोले’ में ‘रामगढ़’ की पहाड़ियां भी एक किरदार हैं। 3डी ने इस किरदार की गहराई में इजाफा किया है। पहाड़ियां ज्यादा सुंदर तो लगती ही हैं, गब्बर सिंह के दृश्यों में आतंक के प्रभाव को भी पहले के मुकाबले बढ़ाती हैं। होली का गाना ‘होली के दिन दिल खिल जाते हैं’ भी नया प्रभाव छोड़ता है। उधर वीरू के सुसाइड सीन का मजा भी बढ़ गया है। कुल मिला कर 3डी ने ‘शोले’ की गहराई और बढ़ा दी है।

‘शोले’ के इस नए अवतार में अगर किसी चीज ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है तो इसकी साउंड क्वालिटी ने। करीब चार दशक पुरानी साउंड को नए सिरे से क्रिएट करना वाकई बेहद मुश्किल रहा होगा। लेकिन इस काम को शोले को 3डी में रूपांतरित करने वाली कंपनी माया डिजिटल स्टूडियो की टीम ने फ्रैंक फॉस्टर के नेतृत्व में बखूबी किया है। बेहतर साउंड क्वालिटी के साथ फिल्म के मशहूर संवादों को सुनना रोचक अनुभव है। वहीं आर.डी. बर्मन के मूल संगीत में छेड़छाड़ किए बगैर मारुति राव और बासु मनोहारी ने फिल्म के गानों को एक नया आयाम दिया है। 70 के दशक के पूर्वार्ध में जब इस फिल्म का निर्माण शुरू हुआ था, तब 3डी तकनीक की कल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। ऐसे में इसका 3डी में रूपांतरण निश्चित रूप से एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा।

‘शोले’ के नए संस्करण में ये चुनौतियां, सीमाओं के रूप में दिखती भी हैं। अगर आपने हॉलीवुड की ‘जुरासिक पार्क’ और ‘टाइटेनिक’ का 3डी संस्करण देखा है तो उनसे इस फिल्म की तुलना न करें। ‘शोले 3डी’ में इन फिल्मों जैसी तकनीकी श्रेष्ठता नहीं है। इसकी एक बड़ी वजह है कि शोले के रिलीज होने का समय ‘जुरासिक पार्क’ से 18 साल और ‘टाइटेनिक’ से 22 साल पहले का है, लिहाजा ये फर्क तो दिखेगा ही। अगर आपने पहले फिल्म देखी है तो इसे 3डी में देखने का एक बिल्कुल अलग और रोमांचक अनुभव होगा और अगर पहले नहीं देखी है (जिसकी संभावना बहुत कम है) तो फिर आप भारतीय सिनेमा की एक कालजयी कृति से आधुनिक तकनीक के साथ रूबरू होंगे। फिल्म के तौर पर शोले को आंकना यहां बेमानी होगा, हां अगर 3डी रूपांतरण के लिहाज से बात करें तो ये शानदार है।

सितारे: धर्मेद्र, संजीव कुमार, अमिताभ बच्चन, हेमा मालिनी, अमजद खान, जया भादुड़ी, हेलन, असरानी, जगदीप, सत्येन कप्पू, इफ्तिखार, मैकमोहन, ए.के. हंगल, सचिन, लीला मिश्र, ओम शिवपुरी
निर्देशक: रमेश सिप्पी
निर्माता: जी.पी. सिप्पी
बैनर: सिप्पी फिल्म्स/शोले मीडिया
स्क्रीन प्ले: सलीम-जावेद
गीत: आनंद बख्शी
संगीत: आर.डी. बर्मन
स्‍टार- 3.5/5
साभार: हिन्‍दुस्‍तान (4 जनवरी 2014 को प्रकाशित)

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