मूवी रिव्यू: डेढ़ इश्किया

राजीव रंजन
इधर सीक्वल के नाम पर ज्यादातर बनी फिल्मों का पिछली कहानी से कोई लेना-देना नहीं होता था, बस हिट फिल्मों के नाम को भुनाने की कोशिश भर होती थी। ‘डेढ़ इश्किया’ उस परिपाटी को तोड़ती है। दो चोर हैं- इफ्तिखार यानी खालू जान (नसीरुद्दीन शाह) और बब्बन (अरशद वारसी)। खालूजान शायराना तबीयत के चोर हैं। बब्बन ठेठ देसी आदमी है, जिसके लिए इश्क का मतलब सेक्स है। एक हैं महमूदाबाद की बेगम पारा (माधुरी दीक्षित नेने), जिनके नवाब मियां अपनी शाहखर्ची की वजह से उन्हें मुफलिसी में छोड़ दुनिया से कूच कर जाते हैं। बेगम की एक हमदर्द है मुनिया (हुमा कुरेशी), जो बहुत स्मार्ट है। एक हैं जान मोहम्मद (विजय राज), जिनके पास दौलत, पावर सब कुछ है, लेकिन वह चाहते हैं नवाब बनना।

बेगम पारा मुनिया की मदद से महमूदाबाद में एक स्वयंवर टाइप का आयोजन करती हैं, ताकि अपनी बाकी की जिंदगी के लिए शौहर चुन सकें। बेगम पारा को अपनी बेगम बनाने के लिए कई नवाब इस स्वयंवर में जुटते हैं तथा अपनी शेरो-शायरी और दूसरे हुनर से बेगम को रिझाने की कोशिश करते हैं। इस दौड़ में खालूजान और जान मोहम्मद भी शामिल हो जाते हैं। खालू के पीछे-पीछे बब्बन भी महमूदाबाद पहुंच जाता है। दोनों का इरादा बेगम की हवेली साफ करना होता है, लेकिन दोनों इश्क में पड़ जाते हैं। जान मोहम्मद का लक्ष्य बेगम का शौहर बन नवाबी पदवी पाना होता है। इस आयोजन से शुरू होता है चोर के पीछे चोर का खेल।

यह फिल्म देशज और नवाबी संस्कृति का अनूठा मेल पेश करती है, एक कंटेम्परेरी थ्रिलर को नवाबी कल्चर की पृष्ठभूमि में पेश करती है। मुशायरे के दृश्यों में अच्छी शेरो-शायरी आपको सुकून देगी तो कई दृश्यों में भदेस संवाद गुदगुदाएंगे। अगर ‘इश्किया’ ने बताया था कि ‘इश्क में सब कुछ वेबजह होता है’ तो ‘डेढ़ इश्किया’ में पता चलता है कि ‘इश्क में सात मकाम होते हैं।’ फिल्म के सेट नवाबी दौर की याद दिलाते हैं। नवाबी राज के गुजर चुके दौर का आइना है बेगम की हवेली। वैसी ही उखड़ी-उखड़ी, उदास और बेरंग। नसीर का किरदार कुछ दृश्यों में ‘मिर्जा गालिब’ की झलक देता है, लेकिन जल्दी ही वे इस चोले को उतार फेंकते हैं। पिछले साल उनकी जितनी फिल्में आई थीं, उसमें वे बेहद साधारण लगे थे, लेकिन यहां वे अपने रुतबे के मुताबिक असर छोड़ते हैं। माधुरी अपनी इस कमबैक फिल्म में काफी ग्रेसफुल लगी हैं।

बेगम के किरदार में वह ठीक लगती हैं, लेकिन डांस सीक्वेंस में तो कमाल हैं। जगावे सारी रैना.. पर उनका क्लासिकल डांस फिल्म की हाइलाइट है। अरशद की टाइमिंग और एक्सप्रेशन कमाल के हैं। नसीर के सामने बराबरी पर खड़े हो पाना अपने आप में एक उपलब्धि है। मुनिया के किरदार में हुमा ने भी छाप छोड़ी है। जहां इतनी अच्छी और दिग्गज स्टार कास्ट हो, वहां विजय राज जैसे कैरेक्टर आर्टिस्ट के लिए क्या स्कोप हो सकता है? यह सवाल मौजूं है, लेकिन अगर कहें कि विजय राज इस फिल्म के सरप्राइज पैकेज हैं तो गलत न होगा। मनोज पाहवा भी प्रभावशाली लगे हैं।

अपनी दोनों फिल्मों- ‘इश्किया’ और ‘डेढ़ इश्किया’ से अभिषेक ने साबित किया है कि उन्हें सिनेमा बनाने का सलीका आता है। फिल्म में किरदारों द्वारा जो अशआर पढ़े गए हैं, वे बशीर बद्र जैसे उम्दा शायर द्वारा लिखे गए हैं। अभिषेक अपनी स्क्रिप्ट से नहीं भटकते और किसी मोह में नहीं फंसते। इस फिल्म को ही लीजिए, उन्होंने माधुरी को 20-25 साल की लड़की दिखाने की कोशिश नहीं की, जिस उम्र में वह हैं, उसी के अनुसार उन्हें पेश किया है। फ्लैशबैक में माधुरी और नसीर के युवावस्था के किरदारों के लिए उन्होंने युवा कलाकारों का सहारा लिया है। फिल्म के हर सीन पर उनकी छाप नजर आती है। हालांकि फिल्म में कुछ खामियां भी हैं। जैसे पिछली फिल्म की तरह इसका संगीत असरदार नहीं है।

कोई भी ओरिजनल गाना जुबान पर चढ़ने वाला नहीं है। हालांकि जो लोग क्लासिकल म्यूजिक के रसिया हैं, उनके लिए इस फिल्म में दो तोहफे हैं। एक है- हमरी अटरिया पे आ जा रे संवरिया.. जिसे बेगम अख्तर ने गाकर अमर कर दिया था और दूसरा है- जगावे सारी रैना..। इन दोनों को रीक्रिएट किया गया है, जिन्हें रेखा भारद्वाज ने बढ़िया ट्रीटमेंट दिया है। ऐसा लगता है, जैसे आज के दौर में ऐसे गानों के साथ उनसे बेहतर न्याय कोई और नहीं कर सकता। डेढ़ इश्किया के खिलाफ कोई बात जा सकती है तो वह है इसकी भाषा।

फिल्म के संवादों में उर्दू-फारसी की मात्रा काफी है, जो शायद आज की पीढ़ी के साथ कनेक्ट न कर सके। लेकिन हां, अगर आप ‘इंतजारी टिकट’ का मतलब वेटिंग लिस्ट और ‘हयात’ का मतलब जिंदगी समझते हैं तो फिल्म में आपको बहुत मजा आएगा। कह सकते हैं कि यह फिल्म ‘पुरानी बोतल में नई शराब’ की तरह है। वैसे जिन्होंने ‘इश्किया’ देखी है, उन्हें इस फिल्म में विद्या बालन की कमी खल सकती है।

सितारे: नसीरुद्दीन शाह, माधुरी दीक्षित नेने, अरशद वारसी, हुमा कुरेशी, विजय राज, मनोज पाहवा, भुवन अरोड़ा, श्रद्धा कपूर
निर्देशक: अभिषेक चौबे
निर्माता: विशाल भारद्वाज और रमन मारु
कहानी: दाराब फारुकी
स्क्रीन प्ले: अभिषेक चौबे और विशाल भारद्वाज
गीत: गुलजार
संगीत: विशाल भारद्वाज
कोरियोग्राफी: बिरजू महाराज और रेमो डिसूजा
स्‍टार- 3.5/5
साभार: हिन्‍दुस्‍तान (11 जनवरी 2014 को प्रकाशित)

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