मूवी रिव्‍यू: क्‍लब 60

राजीव रंजन
आपकी एक दुनिया है, जिसमें आप अपनी खुशियों के साथ जीते हैं और अचानक एक दिन आपकी उस दुनिया का सिरा आपके हाथ से छूट जाता है। फिर दुनिया बेमानी लगने लगती है, जीवन के रंग मटमैले हो जाते हैं, जीने की इच्छा की समाप्त हो जाती है और आप मर भी नहीं पाते। एक अजीब-सी त्रासदी है, जिसमें रोज-रोज मरना पड़ता है। दिमाग कहता है कि मरने वालों के साथ मरा नहीं करते, लेकिन जिंदगी का कोई सिरा हाथ ही नहीं आता। और एक दिन अचानक कोई ऐसा टकरा जाता है, जो जीने की ललक जगाने में कैटेलिस्ट का काम करता है और धीरे-धीरे ही सही जिंदगी अपनी रौ में लौटने लगती है।

डॉ. तारिक शेख (फारुक शेख) और सायरा शेख (सारिका) का बेटा पढ़ने के लिए अमेरिका जाता है और वहां एक सिरफिरे द्वारा की गई गोलीबारी में मारा जाता है। अपने इकलौते बेटे की मौत से मियां-बीवी टूट जाते हैं और अपना सब कुछ बेच कर पुणे से मुम्बई आ जाते हैं। सायरा तो इस गम को झेल लेती हैं और जिंदगी को जीने की कवायद शुरू कर देती हैं, लेकिन तारिक का जिंदगी से लगाव खत्म हो जाता है। वह एक्यूट डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं और एक बार तो अपनी जान देने की कोशिश करते हैं। तारिक भले ही जिंदगी से नाउम्मीद हो चुके थे, लेकिन जिंदगी ने उनसे उम्मीद नहीं खोई थी, लिहाजा वे बच जाते हैं। इसी बीच उनकी जिंदगी में उनकी मर्जी के बगैर घूस आते हैं मन्नूभाई शाह (रघुबीर यादव) और फिर शुरू होता तारिक साहब के जीवन का एक नया अध्याय, जिसका नाम है- क्लब 60।

इस क्लब के हर मेंबर के जीवन में एक ट्रेजेडी है, लेकिन क्लब में आकर उनकी ट्रेजेडी बैक सीट पर चली जाती है। क्लब उनकी ट्रजेडी को अपने दामन में छिपा लेता है और वहां सभी मेंबर सिर्फ अपने वर्तमान को जीते हैं। एक-दूसरे को छेड़ते हैं, एक-दूसरे से झगड़ते हैं। इस क्लब की जान हैं मन्नूभाई, जो सबका इंट्रोडक्शन बड़े मजेदार लफ्जों में देते हैं। फिल्म के अंत में आकर उनका किरदार फिल्म ‘आनंद’ के आनंद की याद दिलाता है। बहुत दिनों के बाद रघुबीर यादव अपने असली रंग में दिखे हैं, जो उनकी खासियत है। अगर कहें कि इस फिल्म के सूत्रधार हैं रघुबीर तो गलत नहीं होगा। फिल्म की सबसे बड़ी खासियत है, इसकी कास्टिंग। हर एक्टर ने अपने किरदार को बेहतरीन तरीके से साकार किया है। फारुक शेख तो अपनी आंखों से ही बहुत कुछ कह देते हैं, संवाद तो बस उनके एक्सप्रेशन को सपोर्ट करते हैं। सारिका की तो जितनी तारीफ की जाए, कम है। जिस ग्रेस और शिद्दत के साथ उन्होंने सायरा के किरदार को जीया है, उसका जवाब नहीं। किसी चीज को खोने के दर्द से ज्यादा बड़ा होता है, उसे खो देने का डर। और इस डर को पूरी तरह साकार कर दिया है सारिका ने। इस फिल्म में क्लब भी एक अहम किरदार है, जो एक खूबसूरत नॉस्टेल्जिया में ले जाता है।

निर्देशक संजय त्रिपाठी ने एक संवेदनशील विषय को जिस खूबसूरती के साथ प्रस्तुत किया है, वह काबिले-तारीफ है। निर्माता के साहस की भी दाद देनी होगी कि उसने ऐसे विषय पर फिल्म बनाने की कोशिश की है, जो व्यावसायिक नजरिये से जोखिम भरा है। फिल्म के संवाद भी फिल्म की यूएसपी हैं। यह फिल्म दो स्तरों पर एक साथ बेहतरीन संतुलन बना कर चलती है। एक तरफ किरदारों की त्रासदी है तो दूसरी तरफ जीवन के प्रति उनका प्रेम। यह फिल्म इमोशंस को झकझोरती है तो हल्के-फुल्के क्षण भी परोसती है। यह फिल्म जीवन के प्रति आस्था पैदा करने वाली खूबसूरत फिल्म है और डिजर्व करती है कि इसे देखा जाए।

क्लब 60
कलाकार- फारुक शेख, सारिका, रघुबीर यादव, सतीश शाह, टीनू आनंद, शरत सक्सेना, जरीना वहाब, विनीत कुमार, सुहासिनी मूले, हिमानी शिवपुरी, हर्ष छाया, मोना वासु।
लेखक एवं निर्देशक- संजय त्रिपाठी
निर्माता- कवी कुमार
बैनर- पल्स मीडिया
संगीत- प्रणीत गेधाम
गीत- नजीर अकबराबादी, डॉ. महेंद्र मधुकर और संजय त्रिपाठी
स्टार- साढ़े तीन
साभार: हिन्‍दुस्‍तान (7 दिसंबर 2013 को प्रकाशित)

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