हजारी प्रसाद द्विवेदी की कुछ पंक्तियाँ

एकांत का तप बड़ा तप नहीं है. संसार में कितना कष्ट है, रोग है, शोक है, दरिद्रता है, कुसंस्कार है. लोग दुख से व्याकुल हैं. उनमें जाना चाहिए. उनके दुख का भागी बनकर उनका कष्ट दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए. यही वास्तविक तप है. जिसे यह सत्य प्रकट हो गया कि सर्वत्र एक ही आत्मा विद्यमान है, वह दुख-कष्ट से जर्जर मानवता की कैसे उपेक्षा कर सकता है.

(" अनामदास का पोथा" उपन्यास का अंश)

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